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क्या ‘टू स्टेट सॉल्यूशन’ के लिए आखिरी कील साबित होने वाली है ट्रम्प की शांति योजना?

इजराइल-हमास सीजफायर के लिए ट्रम्प की शांति योजना का दुनियाभर में स्वागत किया जा रहा है, लेकिन क्या ये दीर्घकालिक समाधान है? या सिर्फ एक विराम

Anshuman द्वारा Anshuman
5 October 2025
in भू-राजनीति, वेस्ट एशिया
इजराइल-हमास के बीच सीजफायर समझौता

डोनाल्ड ट्रम्प की शांति योजना पर फिलहाल नेतन्याहू-हमास दोनों ने हामी भर दी है

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ग़ाज़ा में जारी संघर्ष को ख़त्म करने के लिए बीते सप्ताह अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 20 सूत्रीय योजना पेश की। योजना के अनुसार हमास को 7 अक्टूबर के हमले में बंधक बनाए गए सभी इजराइलियों को (जीवित या मृत) इज़राइल को सौंपना है। बदले मे इज़राइल भी अपनी जेलों में बंद फिलिस्तीनियों को रिहा करेगा। जैसे–जैसे बंधकों की रिहाई के साथ ये शांतिवार्ता आगे बढ़ेगी, इज़राइल गाजा से पीछे हटता जाएगा।
इस योजना के मुताबिक़ हमास को गाज़ा से अपना नियंत्रण और हथियार पूरी तरह छोड़नें होंगे और ये नियंत्रण गाजा के लोगों को दिया जाएगा, जो एक शांति बोर्ड (इसके चेयरमैन ख़ुद ट्रम्प होंगे) के साथ मिलकर गाजा का प्रशासन संभालेंगे। यही नहीं गाजा में एक अंतर्राष्ट्रीय शांति सेना की भी तैनाती होगी जो सुरक्षा का जिम्मा संभालेगी। इसके अलावा गाजा के पुर्ननिर्माण और कारोबारी गतिविधियों को बढ़ावा देने की भी योजना है।
इज़राइल ने पहले ही ट्रम्प की इस शांति योजना पर सहमति जता दी थी, वहीं ट्रम्प की धमकियों के बाद आख़िरकार हमास भी इस सीज़फायर प्रस्ताव पर राजी हो गया है और सोमवार से मिस्र के ज़रिए दोनों पक्षों के बीच बातचीत शुरू होगी।
इस शांति प्रस्ताव का दुनिया के ज़्यादातर देशों ने स्वागत किया है, यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्रम्प को इस पहल के लिए शुभकामनाएं प्रेषित की हैं।
लेकिन ये सिर्फ सीजफायर है, समाधान नहीं और पुरानी योजनाओं की तरह ये योजना कितनी टिकाऊ होगी इस पर अभी भी प्रश्नचिन्ह हैं।
हमास और उसके हितैषी इस योजना को सिर्फ एक पॉज़ (विराम) की तरह देख रहे हैं और उनके द्वारा पहले भी स्वतंत्र फिलिस्तीन के निर्माण तक युद्ध लड़ने की बातें कही जाती रही हैं।
इससे उलट ज़्यादातर जानकारों का मानना है कि इस योजना के अमल में आने के बाद स्वतंत्र फिलिस्तीन का रास्ता पूरी तरह न सही, लेकिन लगभग बंद हो जाएगा। वो रास्ता जो ‘टू स्टेट सॉल्यूशन’ या द्विराष्ट्र समाधान के ज़रिए फिलिस्तीनियों को अपने मुल्क तक ले जाता।

ट्रम्प की शांति योजना: क्या अब भी मुमकिन है ‘टू स्टेट सॉल्यूशन’ ?

इज़राइल–फ़िलिस्तीन का झगड़ा आधुनिक दुनिया का एक बड़ा और अहम मुद्दा रहा है, जो उम्मीदों, हिंसा, बातचीत और निराशा के दौर से गुज़रते हुए सौ साल से ज़्यादा पुराना हो चुका है। इस पुराने संघर्ष की जड़ में यह सवाल है कि आपसी राष्ट्रवाद, ज़मीन के दावे और गहरी दुश्मनी को कैसे सुलझाया जाए। इस झगड़े को खत्म करने के लिए जितने भी रास्ते सुझाए गए हैं, उनमें से ‘दो–राज्य समाधान‘ (टू–स्टेट सॉल्यूशन)—जिसमें इज़राइल के साथ एक आज़ाद फ़िलिस्तीनी देश बनाने की कल्पना है—को दुनिया में सबसे ज़्यादा समर्थन मिला है।

मगर, जब इसे पहली बार सोचा गया था, उसके सत्तर साल से ज़्यादा बीत जाने के बाद, इस समाधान के कामयाब होने पर सवाल उठने लगे हैं। बातचीत बढ़ कम रही है, अटक ज्यादा रही है। इसी के साथ ज़मीनी राजनीति भी बदल रही है, और देश के अंदर और बाहर दोनों तरफ़ से दबाव बढ़ रहा है, तो हमें पूछना होगा: क्या यह रास्ता सचमुच शांति दिला सकता है, या यह अब पुराना ख़्याल बन गया है?

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20वीं और 21वीं सदी की शुरुआत के बड़े हिस्से में, ‘टू स्टेट सॉल्यूशन’ को इज़राइल–फ़िलिस्तीन झगड़े का सबसे व्यवहारिक और सही हल माना जाता रहा है। इस मॉडल के अनुसार दो आज़ाद देशों—इज़राइल और फ़िलिस्तीन—के आपस में तय की गई सीमाओं के साथ शांति से रहने की कल्पना थी। संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ और अमेरिका के कई प्रशासनों सहित पूरी दुनिया ने इस फॉर्मूले का समर्थन किया है, और पिछले कई दशकों की ज़्यादातर कूटनीतिक कोशिशें इसी फ्रेमवर्क पर टिकी थीं।

लेकिन, ज़मीन पर हालात मुश्किल हैं—फ़िलिस्तीनी इलाकों पर इज़राइल का कब्ज़ा, इज़राइली बस्तियों का बढ़ना, फ़िलिस्तीनी राजनीति में फूट पड़ना, और शांति प्रक्रिया से भरोसा उठना—इन सब ने ‘दो–राज्य समाधान’ कीकामयाबीपरगंभीरसवालखड़ेकरदिएहैं।

तो क्या मान लिया जाए कि ‘टू स्टेट सॉल्यूशन’ एक ज़िन्दा लाश से ज्यादा और कुछ नहीं? और अगर ये उपाय कारगर नहीं है तो फिर इज़राइल और फिलिस्तीन के बीच शांति का रास्ता क्या है?

इतिहास और झगड़े की शुरुआत

इज़राइल–फ़िलिस्तीन झगड़े की जड़ें 19वीं सदी के आख़िर और 20वीं सदी की शुरुआत में उठे विरोधी राष्ट्रवादी आंदोलनों में हैं। 1800 के दशक के आख़िर में ज़ायोनिज़्म (Zionism) नाम का यहूदी राष्ट्रवादी आंदोलन शुरू हुआ, जिसका मक़सद येरुशलम के आसपास यहूदियों के लिए अपना यहूदी देश (मातृभूमि) बनाना था। यूरोप में सताए जा रहे यहूदियों के मन में पहले ही अपने अलग ‘यहूदी देश’ की धारणा मज़बूत हो रही थी।

प्रताड़ित यहूदियों ने फ़िलिस्तीन (जो उस समय ओटोमन साम्राज्य का हिस्सा था) में आना शुरू किया। ये वो धरती थी जो उनकी धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक़ उनके यहोवा ने उनके पूर्वज इज़राइल और उनकी संतानों को दी थी। यहूदियों ने वहां रह रहे फिलिस्तीन अरबों से ज़मीनें खरीदीं और रहने लगे।

जिस समय दुनिया भर से यहूदी येरुशलम पहुँच रहे थे, ठीक उसी समय, अरब राष्ट्रवाद भी मज़बूत हो रहा था, और जल्दी ही येरुशलम और आसपास के इलाकों में पहले से ही मौजूद फ़िलिस्तीनी अरब, यहूदियों की बढ़ती संख्या को अपनी राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान के लिए ख़तरनाक मानने लगे।

पहले विश्वयुद्ध के दौरान ही ब्रिटेन ने बालफ़ोर ऐलान (1917) के तहत, इस इलाके में यहूदियों को उनका अपना देश बनाने में मदद करने का वादा किया था। हालांकि इस घोषणा में गैर–यहूदी समुदायों के अधिकारों की रक्षा की भी बात कही गई थी।

ब्रिटेन के इस ऐलान के बाद दुनिया भर के यहूदी मिस्र में सिनाई प्रांत और जॉर्डन नदी के किनारे मौजूद इस धरती का रुख़ करने लगे। 1920 और 1930 के दशक में यहूदियों की बढ़ती संख्या से स्थानीय अरब आबादी के साथ तनाव बढ़ा, जो हिंसक झड़पों में बदल गया। ब्रिटिश, इस झगड़े को सुलझा नहीं पाए, तो उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के बाद यह मामला संयुक्त राष्ट्र को सौंप दिया।

1947 में, संयुक्त राष्ट्र ने विभाजन योजना पेश की, जिसमें फ़िलिस्तीन को दो देशों—एक यहूदी और एक अरब—में बाँटने का प्रस्ताव था साथ ही येरूशलम को अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण में रखने की बात थी। यहूदी नेतृत्व ने इस योजना को मान लिया, लेकिन अरब देशों और फ़िलिस्तीनी नेताओं ने इसका सख़्त विरोध करते हुए इसे सिरे से ख़ारिज कर दिया। अरब देशों के इस विरोध के चलते ही 1948 का अरब–इज़राइल युद्ध शुरू हुआ। जिसका अंत अरब देशों के संगठनों की हार और इज़राइल राष्ट्र की स्थापना के साथ हुआ। इस युद्ध में 7 लाख से ज़्यादा फ़िलिस्तीनी बेघर हो गए—जिसे फ़िलिस्तीनी ‘नक़बा‘ या “त्रासदी” के तौर पर याद करते हैं।

इज़राइल और फ़िलिस्तीनियों की ज़मीनी हदें 1967 के ‘सिक्स डे वॉर’ के बाद और बदल गईं। इस युद्ध में इज़राइल ने वेस्ट बैंक, गाजा पट्टी और पूर्वी यरूशलेम पर कब्ज़ा कर लिया—यही वे इलाक़े हैं जिन्हें फ़िलिस्तीनी अपने भविष्य के देश के लिए चाहते हैं। ये इलाक़े तब से इस झगड़े की जड़ बने हुए हैं।

ओस्लो समझौता और शांति की उम्मीद

1993 का ओस्लो समझौता शांति प्रक्रिया में एक अहम मोड़ था। इसमें इज़राइल और फ़िलिस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) ने एक–दूसरे को मान्यता दी और पक्की शांति के लिए एक रोडमैप बनाया। ओस्लो फ्रेमवर्क में ‘टू स्टेट सॉल्यूशन’ की कल्पना थी, जिसमें फ़िलिस्तीनी अथॉरिटी (PA) को वेस्ट बैंक और गाजा के कुछ हिस्सों में सीमित ऑटोनॉमी मिली। इस समझौते में सीमा, शरणार्थी, सुरक्षा और यरूशलेम की स्थिति जैसे बड़े मुद्दों को सुलझाने की योजना भी तय की गई थी।

कुछ समय के लिए, ओस्लो समझौते से काफ़ी उम्मीद जगी थी। मगर, ये उम्मीदें ज़्यादा दिन नहीं चलीं। समझौते ने फ़िलिस्तीनियों को सीमित शासन तो दिया, लेकिन ज़रूरी मुद्दे—जैसे यरूशलेम का भविष्य, फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों की वापसी का अधिकार, और फ़िलिस्तीन देश की सीमाएँ—अनसुलझे रह गए। जैसे–जैसे बातचीत रुकी, कूटनीति की जगह हिंसा ने ले ली—जिसका नतीजा दूसरे इंतिफ़ादा (2000-2005) के रूप में सामने आया।

इजराइली पीएम की हत्या के बाद फीका पड़ा ओस्लो का वादा

1995 में इज़राइली प्रधानमंत्री यित्ज़ाक राबिन की हत्या हो गई। रॉबिन शांति प्रक्रिया के मुख्य सूत्रधार थे और शांति के यही प्रयास उनकी मौत का कारण बने। हत्यारा कोई और नहीं, एक अतिरूढवादी इजराइली छात्र था, जो ओस्लो समझौते को यहूदियों और इजराइलियों के ख़िलाफ़ मानता था।
यित्जाक रॉबिन की हत्या के बाद नई सरकार में वेस्ट बैंक और पूर्वी यरूशलेम में इज़राइली सेटलमेंट्स (बस्तियों) के निर्माण में और तेजी आ गई, जबकि शांति वार्ता की रफ़्तार पर ब्रेक लग गया।

‘दो–राज्य समाधान’ के रास्ते में शायद सबसे बड़ी रुकावट फ़िलिस्तीनी कब्ज़े वाले इलाकों में इज़राइली बस्तियों का निर्माण ही है।1967 से, इज़राइल की सरकारों ने अंतरराष्ट्रीय विरोध के बावजूद वेस्ट बैंक और पूर्वी यरूशलेम में बड़ी बस्तियाँ बनाने की मंज़ूरी दी है। आज, 6 लाख से ज़्यादा इज़राइली वेस्ट बैंक और पूर्वी यरूशलेम की इन बस्तियों में रहते हैं—ये वे इलाक़े हैं जिन पर फ़िलिस्तीनी अपने भविष्य के देश का दावा करते हैं।

इज़राइल के आलोचक इसे फ़िलिस्तीनी ज़मीन पर कब्ज़े के रूप में देखते है और उनका मानना है कि इनकी वजह से एक व्यवहारिक फ़िलिस्तीनी देश का निर्माण असंभव होता जा रहा है।

यरूशलेम: एक विवादित शहर

इज़राइल–फ़िलिस्तीन झगड़े में सबसे ज़्यादा विवादित मुद्दों में से एक यरूशलेम भी है। इज़राइली और फ़िलिस्तीनी दोनों इस ऐतिहासिक और धार्मिक शहर को अपनी राजधानी मानते हैं। इज़राइल के लिए, पूरा यरूशलेम यहूदी देश की अविभाज्य राजधानी है। तो वहीं फ़िलिस्तीनियों के लिए, पूर्वी यरूशलेम—जिसे इज़राइल ने 1967 में छीन लिया था—उनके होने वाले देश की सही राजधानी है। शहर का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व किसी भी समझौते को और भी पेचीदा बना देता है।

2017 में अमेरिका ने यरूशलेम को इज़राइल की राजधानी के रूप में मान्यता देकर दशकों पुरानी कूटनीतिक सहमति को तोड़ दिया। फ़िलिस्तीनियों ने इस क़दम को इज़राइल के दावों का एकतरफ़ा समर्थन माना। किसी भी संभावित शांति समझौते में इस शहर की स्थिति को सुलझाना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।

बदलती क्षेत्रीय राजनीति

हाल के सालों में, क्षेत्रीय हालात इस तरह से बदले हैं कि फ़िलिस्तीनी मुद्दा पीछे छूट गया है। 2020 का अब्राहम समझौता, जिनके तहत इज़राइल और संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, सूडान और मोरक्को जैसे कई अरब देशों के बीच संबंध सामान्य हुए–  मध्य पूर्व में बदलती प्राथमिकताओं को दर्शाता है। ये समझौते ईरान की चिंता और व्यापक क्षेत्रीय स्थिरता की वजह से हुए। हालाँकि इनसे इज़राइल को फ़ायदा हुआ, फ़िलिस्तीनियों ने इन्हें अरब लीग की फ़िलिस्तीनी हित के प्रति पुरानी प्रतिबद्धता से विश्वासघात माना।

अरब कूटनीति में फ़िलिस्तीनी मुद्दे का केंद्रीय महत्व कम होना, दो–राज्य समाधान के लिए सबसे बड़ा झटका है, जो ऐतिहासिक रूप से व्यापक क्षेत्रीय समर्थन पर निर्भर था। भले ही अरब जगत आधिकारिक तौर पर फ़िलिस्तीनी देश के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन उनका ध्यान अब ईरान के प्रभाव का मुकाबला करने और आर्थिक चिंताओं जैसे दूसरे क्षेत्रीय मुद्दों को संभालने पर है।

दो–राज्य समाधान की घटती संभावना

‘दो–राज्य समाधान’ के कामयाब होने की उम्मीदें हाल के सालों में तेजी से कम हुई हैं।डॉनल्ड ट्रम्प के नए सीजफायर प्रस्ताव के बाद ये उम्मीद और कम हो चुकी है। इज़राइली बस्तियों के विस्तार और फ़िलिस्तीनी नेतृत्व में राजनीतिक फूट ने बातचीत से समाधान की तरफ़ बढ़ने की किसी भी सार्थक कोशिश को और मुश्किल बना दिया है। इसके अलावा, लंबे वक्त से चल रहे सशस्त्र संघर्ष के बाद इज़राइल भी अपनी सुरक्षा को लेकर कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता। 7 अक्टूबर को हुए वीभत्स आतंकी हमले ने इज़राइल के अंदर मौजूद उदारवादी आवाज़ों को न सिर्फ कमज़ोर किया है, बल्कि फिलिस्तीन के निर्माण की किसी भी प्रक्रिया में शामिल न होने के लिए प्रतिबद्ध भी किया है।

ज़ाहिर है इज़राइल या दुनिया का कोई भी देश ऐसा कोई भी मुल्क अपने पड़ोस में नहीं चाहेगे– जिसकी कमान परोक्ष या अपरोक्ष रूप से हमास जैसे आतंकी संगठनों के हाथ में हो और इज़राइल का पूरी तरह खात्मा ही उनका लक्ष्य हो।

इजराइल–फिलीस्तीन समस्या का समाधान क्या है?

चूँकि ‘दो–राज्य का समाधान’ कमज़ोर पड़ रहा है, ऐसे में अब दूसरे प्रस्तावों को भी महत्व मिलने लगा है। ऐसा ही एक प्रस्ताव है ‘एक–राज्य समाधान‘ (वन–स्टेट सॉल्यूशन), जिसमें इज़राइली और फ़िलिस्तीनी दोनों शामिल हों। जहाँ सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलें, चाहे वे किसी भी जाति या धर्म के हों। ये मॉडल सुनने में भले ही अच्छा लगता हो, लेकिन ये इज़राइल के यहूदी देश होने के मूल सिद्धांत को चुनौती देता है। इसी वजह से ये इज़राइलियों के लिए राजनीतिक रूप से अस्वीकार्य मॉडल है। इसके अलावा, दोनों समुदायों के बीच गहरी दुश्मनी को देखते हुए, ऐसे देश में असली साथ–साथ रहना हासिल करना बेहद मुश्किल होगा।

एक और उभरता हुआ प्रस्ताव है एक तरह के ‘परिसंघ‘ (Confederation) का निर्माण, जिसमें दो अलग–अलग देश तो बने रहेंगे, लेकिन सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढाँचे जैसे मुद्दों पर साझा संस्थान और मिलकर काम करने वाली शासन व्यवस्था होगी। हालाँकि, इज़राइलियों और फ़िलिस्तीनियों के बीच गहरे अविश्वास और बँटवारे को देखते हुए ‘वन स्टेट सॉल्यूशन’ की तरह, ‘परिसंघ‘ के विचार को भी बड़ी वैचारिक, लॉजिस्टिक और राजनीतिक रुकावटों का सामना करना पड़ेगा और ये भी शायद ही मुमकिन हो।

क्या दो–राज्य समाधान अब भी मुमकिन है?

‘दो–राज्य समाधान’ इज़राइल–फ़िलिस्तीन संघर्ष को सुलझाने के लिए सबसे ज़्यादा मान्य रास्ता बना हुआ है, लेकिन इसके कामयाब होने पर सवाल बढ़ता जा रहा है। फिर भी, इसके असंभव होते जाने के बावजूद, ‘टू स्टेट सॉल्यूशन’ का सांकेतिक और व्यावहारिक मूल्य अब भी है। यह एक ऐसे समझौते को दर्शाता है जिसमें इजराइलियों और फिलिस्तीनियों दोनों की राष्ट्रीय इच्छाओं को मान्यता दी गई हैं और शांति की तरफ़ एक संभावित रास्ता खोजा गया है। हालाँकि, जब तक राजनीतिक नेतृत्व, लोगों की राय और क्षेत्रीय माहौल में कोई बड़ा बदलाव नहीं आता, तब तक ‘दो–राज्य समाधान’ दूर की कौड़ी ही रहेगा।

बातचीत में कोई सफलता न मिलने पर, अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने संघर्ष को लेकर अपने नज़रिए पर फिर से सोचने की बड़ी चुनौती है। क्या दो–राज्य समाधान को फिर से ज़िंदा किया जा सकता है, या क्या इसे नए रास्तों के लिए जगह देनी होगी, यह समकालीन अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सबसे ज़रूरी और अनसुलझे सवालों में से एक बना हुआ है।

अंशुमान

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