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वैश्विक ‘जरासंध’ का छल-बल और ‘केशव’ का संघ

जरासंध की शक्ति थी बाहरी दबाव, गठबंधन और घेराबंदी। केशव की रणनीति थी समाज को भीतर से संगठित करना।

Dr. Mahender द्वारा Dr. Mahender
4 September 2026
in मत
वैश्विक ‘जरासंध’ का छल-बल और ‘केशव’ का संघ

वैश्विक ‘जरासंध’ का छल-बल और ‘केशव’ का संघ

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आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है। आज के दिन हम प्रायः श्रीकृष्ण के बालरूप को याद करते हैं। माखन चुराने वाले नटखट कान्हा, मुरली बजाने वाले गोप गोपियों संग लीला करने वाले गोपाल। इसके अलावा श्रीकृष्ण के और भी रूप हैं। उन्हीं में एक वह रूप है, जिसमें उन्होंने जरासंध जैसी शक्तिशाली सत्ता से सीधे टकराने के बजाय परिस्थिति को समझा, अपने लोगों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी, मथुरा से द्वारका की ओर रणनीतिक स्थानांतरण किया और अंततः ऐसी शक्ति संरचना तैयार की जिसने जरासंध के प्रभाव को निर्णायक रूप से चुनौती दी।

महाभारत काल में श्रीकृष्ण के सामने मगध का शक्तिशाली राजा जरासंध था। जरासंध अकेला नहीं था। उसके पीछे एक विशाल राजनीतिक शक्ति खड़ी थी। अनेक राजा उसके प्रभाव में थे, अनेक उसके साथ थे और अनेक उसके भय से उसके सामने झुकते थे। उसकी शक्ति उसकी अपनी सेना में तो थी ही, उसके साथ उस व्यापक तंत्र में भी थी, जिसने उसके प्रभाव को दूर-दूर तक फैला रखा था। वह केवल युद्ध के मैदान में ही नहीं लड़ता था, वह अपने प्रभाव, गठबंधनों और दबाव के माध्यम से विरोधी को चारों ओर से घेरता था। मथुरा पर उसके बार-बार के आक्रमण इसी शक्ति का परिचय थे।

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कंस के वध के बाद श्रीकृष्ण उसके सीधे निशाने पर आ गए। जरासंध के लिए यह केवल व्यक्तिगत प्रतिशोध का विषय नहीं था। उसके सामने एक ऐसी शक्ति उभर रही थी, जिसे वह अपने प्रभाव के लिए चुनौती मानता था। इसलिए उसने बार-बार मथुरा पर आक्रमण किया। लेकिन यहीं से श्रीकृष्ण का वह रूप सामने आता है, जिसे केवल मुरली बजाने वाले कृष्ण के रूप में देखने पर हम समझ ही नहीं सकते।

श्रीकृष्ण ने जरासंध की शक्ति को केवल उसकी सेना की संख्या से नहीं आँका। उन्होंने उसके पीछे खड़े तंत्र को समझा। उन्होंने यह भी समझा कि हर संघर्ष का उत्तर सीधे टकराव में देना आवश्यक नहीं होता। कभी-कभी सबसे बड़ी रणनीति यह होती है कि अपनी शक्ति को सुरक्षित रखा जाए, समाज को संगठित किया जाए और संघर्ष के लिए ऐसी भूमि तैयार की जाए जहाँ विरोधी की शक्ति स्वयं उसके लिए पर्याप्त न रहे।

जरासंध की शक्ति थी बाहरी दबाव, गठबंधन और घेराबंदी। केशव की रणनीति थी, समाज को भीतर से संगठित करना। जरासंध विरोधी को चारों ओर से घेरता था। केशव समाज के भीतर बिखरी शक्तियों को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास करते थे। एक व्यवस्था नैरेटिव के माध्यम से धारणा बदलना चाहती है, दूसरी दीर्घकालीन संगठन के माध्यम से वास्तविकता बदलने का प्रयास करती है।

श्रीकृष्ण ने जरासंध को उसकी शक्ति के अनुपात में चुनौती नहीं दी। उन्होंने उसकी कमजोरी को समझकर उसकी शक्ति की संरचना को तोड़ा। यही केशव की विशेषता थी। वे हर लड़ाई शस्त्रों से नहीं लड़ते थे। वे कई लड़ाइयाँ संगठन, रणनीति, समय और सही सहयोगी चुनकर जीतते थे।

आज ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के सामने कोई एक जरासंध नहीं है। यहाँ जरासंध एक रूपक है। यह उस वैश्विक नैरेटिव का प्रतीक है जिसमें संघ को लेकर एक निश्चित छवि बनाने का कुत्सित प्रयास दिखाई देता है। आज का संघर्ष भी केवल मैदान में नहीं है। आज लड़ाई धारणा की है, नैरेटिव की है और उस छवि की है, जिसे लगातार दोहराकर सत्य के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। ऐसे में संघ की चुनौती किसी एक व्यक्ति या किसी एक संगठन से नहीं, बल्कि उस पूरे वैश्विक नैरेटिव तंत्र से है जो उसके बारे में पहले निष्कर्ष तय करता है और फिर उसी के अनुरूप प्रमाण तलाशता है। इसी वैश्विक नैरेटिव तंत्र का हिस्सा पाकिस्तान लंबे समय से संघ और हिंदुत्व को भारत की विदेश और घरेलू नीति के संदर्भ में नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करता रहा है। बांग्लादेश भी संघ और हिंदू संगठनों को लेकर राजनीतिक और वैचारिक विमर्श प्रस्तुत करता रहा है। दूसरी ओर संघ स्वयं बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा को लेकर आवाज उठाता रहा है। पश्चिमी देशों में भी संघ को लेकर विमर्श चलता है। अनेक विदेशी मीडिया हाउस इसमें सक्रिय हैं। कनाडा और अमेरिका में संघ को लेकर आरोपों और विरोध के स्वर सुनाई दिए हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष के समापन की दहलीज पर खड़ा है। इसी समय संघ को लेकर भारत के बाहर भी बहस तेज हुई है। संघ के शताब्दी वर्ष के वैश्विक संपर्क अभियान के तहत संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन का दौरा इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। न्यूयॉर्क में मोहनजी ने विविधता, एकता और मानवता के साझा आधार की बात की। उन्होंने भारत की विविधता को उसकी कमजोरी नहीं, उसकी शक्ति बताया। टोरंटो में उन्होंने भारत के विश्वगुरु बनने को प्रभुत्व या महाशक्ति बनने के बजाय सेवा और मानवता से जोड़ा। ब्रिटेन में वे अभी बोलेंगे। अमेरिका और कनाडा से दिया गया संदेश केवल भारतीय श्रोताओं के लिए नहीं था। यह उस वैश्विक मंच के लिए भी था जहाँ संघ को लेकर पहले से अनेक धारणाएँ मौजूद हैं।

मोहनजी का प्रवास मात्र विदेश यात्रा नहीं है। इसे उस नैरेटिव के सामने संघ की अपनी उपस्थिति के रूप में भी देखा जा सकता है जिसे विरोधी गढ़ते रहते हैं। यह कुछ ऐसा है कि यदि किसी संगठन के बारे में दुनिया को केवल वही बताया जाए जो उसके विरोधी बताना चाहते हैं, तो वह संगठन स्वयं सामने आकर अपनी बात क्यों न रखे? यहीं श्रीकृष्ण और जरासंध का प्रसंग आज फिर प्रासंगिक हो जाता है।

नैरेटिव का उत्तर केवल नारों से नहीं दिया जा सकता। उसके लिए उपस्थिति चाहिए, संवाद चाहिए, अपना पक्ष रखने का आत्मविश्वास चाहिए और सबसे बढ़कर, ऐसा सामाजिक कार्य चाहिए जिसे केवल प्रचार के माध्यम से खारिज करना आसान न हो। संघ यही कर रहा है और यही श्रीकृष्ण की रणनीति थी। वे जरासंध के पास जाकर हर बार यह सिद्ध करने में नहीं लगे कि कृष्ण सही हैं और जरासंध गलत। उन्होंने अपनी शक्ति को संगठित किया, अपना केंद्र बनाया, सहयोगियों को जोड़ा, समय की प्रतीक्षा की और जब निर्णायक क्षण आया तब भीम और अर्जुन को साथ लेकर उसके घर में भी घुसे और परिणाम सामने था।

जन्माष्टमी यह याद करने का पर्व तो है ही कि हजारों वर्ष पहले श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था, इसके साथ ही यह समझने का अवसर भी है कि श्रीकृष्ण ने विपरीत परिस्थितियों में कैसे कार्य किया। उन्होंने शक्ति का अर्थ केवल शस्त्र नहीं माना, उन्होंने रणनीति को कायरता नहीं माना, उन्होंने पीछे हटने को पराजय नहीं माना, उन्होंने सहयोग को कमजोरी नहीं माना और उन्होंने संगठन को विजय की पहली शर्त माना। इसीलिए जरासंध के सामने कृष्ण का मॉडल आज भी प्रासंगिक दिखाई देता है।

जरासंध के पास विशाल शक्ति थी (आज संघ के विरोध में खड़ी शक्तियों के पास भी प्रभाव, संसाधन और अपना एक व्यापक तंत्र है), केशव के पास उससे अधिक महत्त्वपूर्ण चीज थी, दृष्टि (आज संघ के पास भी अपनी दृष्टि और विशिष्ट कार्यपद्धति है)। जरासंध के पास सामर्थ्य था (संघ के विरोधियों के पास भी सामर्थ्य और प्रभाव की कमी नहीं है) केशव के पास संगठन कौशल था (जो आज संघ के पास भी है)। जरासंध संघर्ष को अपनी शर्तों पर चलाना चाहता था (संघ विरोधी बार-बार वही गिने चुने आरोप लगाकर यही सब करते रहते हैं, जबकि संघ का शीर्ष नेतृत्व कई बार सप्रमाण उत्तर दे चुका है), केशव ने संघर्ष की शर्तें ही बदल दीं (सरसंघचालक ने अमेरिका और कनाडा में कुछ ऐसा ही संकेत किया)।

संघ विरोधी शक्तियाँ झूठा नैरेटिव बनाकर जरासंध की तरह छलबल का उपयोग कर रही हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने विरुद्ध बनने वाले नैरेटिव का उत्तर हर आरोप के पीछे भागकर नहीं दे रहा है। वह श्रीकृष्ण नीति के अनुसार अपना संगठन, अपना संवाद, अपना सामाजिक कार्य और अपना वैश्विक संपर्क इतना मजबूत करने में लगातार लगा हुआ है कि किसी बाहरी नैरेटिव के लिए उसकी पूरी पहचान तय करना संभव ही न रहे। इसलिए जन्माष्टमी पर कान्हा को केवल मुरली में मत खोजिए। उन्हें संघ जैसे संगठन की उस रणनीति में खोजिए, जिसने जरासंध जैसे शक्तिशाली विरोधी के सामने भी भविष्य को अपने पक्ष में मोड़ दिया था। यही केशव की शक्ति थी और यही संघ जैसे दीर्घजीवी संगठन की विशेषता भी है। नारायणायेती समर्पयामि…………

 

Tags: 100 Years of RSSBhagwan Shri KrishnaJanmashtamiJarasandhaMahabharatMohan Bhagwat's messageRSS chiefSangh Shatabdi VarshShri Krishnaश्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2026
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