हरियाणा-पंजाब में पराली जलाने की घटनाएं कम हो रही हैं या फिर सैटेलाइट की नजर से आग बच निकल रही है? यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि सरकारी आंकड़ों में खेतों में आग लगाने की घटनाएं तेजी से घटी हैं। 2021 में जहां करीब 80 हजार पराली जलाने की घटनाएं दर्ज हुई थीं, वहीं 2025 में यह संख्या करीब 6 हजार बताई गई। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि खेतों में पराली जलाना भी उतना ही कम हो गया है?
इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए पर्यावरण और टिकाऊ विकास पर काम करने वाली संस्था iFOREST ने Fire Watch नाम का नया मल्टी-सैटेलाइट डैशबोर्ड लॉन्च किया है। इसकी खासियत यह है कि यह सिर्फ खेतों में आग की गिनती नहीं करेगा, बल्कि यह भी पता लगाने की कोशिश करेगा कि आग कब लगाई गई, कहां लगाई गई और कितने खेत इससे प्रभावित हुए।
यानी अब पराली जलाने की निगरानी का तरीका सिर्फ आग की लपटें गिनने तक सीमित नहीं रहेगा। सैटेलाइट तस्वीरों के जरिए यह भी समझने की कोशिश होगी कि जमीन पर वास्तव में कितना नुकसान हुआ है।
सवाल यह भी है कि क्या अब तक सैटेलाइट की निगरानी में कुछ आग छूट जाती थीं? क्या किसान सैटेलाइट के गुजरने के समय को ध्यान में रखकर पराली जला सकते हैं? और भारत के पास क्या ऐसा अपना सैटेलाइट है, जो हर समय खेतों पर नजर रख सके? समझते हैं…
Fire Watch क्या है, पराली जलाने की निगरानी कैसे करेगा?
Fire Watch को iFOREST यानी International Forum for Environment, Sustainability and Technology ने विकसित किया है। यह एक ऑनलाइन मल्टी-सैटेलाइट डैशबोर्ड है। इसे 5 नवंबर 2026 को लॉन्च किया गया।
इसकी शुरुआत चार राज्यों से हुई है:
पंजाब
हरियाणा
उत्तर प्रदेश
मध्य प्रदेश
आने वाले समय में दूसरे राज्यों को भी इसमें शामिल करने की योजना है।
इस डैशबोर्ड की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पराली जलाने की समस्या को तीन अलग-अलग पैमानों पर देखता है।
| निगरानी का पैमाना | क्या पता चलेगा? |
|---|---|
| Active Fire Count | कितनी जगहों पर आग का पता चला और कहां-कहां आग लगी |
| Daily Fire Timing | दिन के किस समय पराली जलाने की घटनाएं ज्यादा हुईं |
| Burnt Area | कितने वर्ग किलोमीटर खेतों में जलने के निशान मिले |
इन तीनों आंकड़ों को एक साथ देखने से यह समझने में मदद मिलेगी कि किस जिले में पराली जलाने की गतिविधि कितनी है और समस्या का वास्तविक भौगोलिक विस्तार कितना हो सकता है।
Active Fire Count का मतलब जमीन पर लगी आग की वास्तविक कुल संख्या नहीं है। यह सैटेलाइट द्वारा दर्ज किए गए फायर डिटेक्शन की संख्या है। एक ही आग अलग-अलग सैटेलाइट से एक से अधिक बार दर्ज हो सकती है। दूसरी तरफ छोटी या कम समय तक जलने वाली आग छूट भी सकती है।
अब तक पराली जलाने की निगरानी में क्या कमी थी?
अब तक पराली जलाने की घटनाओं की निगरानी में मुख्य रूप से पोलर ऑर्बिटिंग सैटेलाइट का इस्तेमाल होता रहा है।
ये ऐसे सैटेलाइट हैं जो पृथ्वी के ध्रुवों के आसपास से गुजरते हुए अलग-अलग समय पर धरती के हिस्सों की तस्वीरें लेते हैं। ये एक ही जगह पर लगातार नजर नहीं रख सकते।
इसे एक उदाहरण से समझते हैं, मान लीजिए पंजाब के किसी खेत में किसान ने दोपहर 3 बजे पराली जलाई। लेकिन उस इलाके के ऊपर संबंधित सैटेलाइट सुबह 10:30 बजे या दोपहर 1:30 बजे से गुजर चुका है।
ऐसे में अगर आग सैटेलाइट के गुजरने के बाद लगी और अगले निरीक्षण से पहले बुझ गई, तो उसके Active Fire के रूप में दर्ज होने की संभावना कम हो सकती है। यानी सैटेलाइट ने उस खेत की तस्वीर तो ली, लेकिन आग लगने के समय वहां मौजूद नहीं था। यही है सैटेलाइट मॉनिटरिंग का टाइम गैप।
iFOREST की 2025 की स्टडी के मुताबिक, पारंपरिक निगरानी में इस्तेमाल होने वाले MODIS और VIIRS सैटेलाइट दिन के सीमित समय में ही खेतों पर नजर रखते हैं। इसके उलट, कई बड़े खेतों में आग दोपहर 3 बजे के बाद लगाई जा रही थी। इस कारण दर्ज होने वाली घटनाओं और वास्तविक गतिविधि के बीच अंतर पैदा हो सकता है।
Fire Watch किन सैटेलाइट की मदद लेगा?
Fire Watch की खासियत यह है कि इसमें अलग-अलग सैटेलाइट के डेटा को मिलाकर इस्तेमाल किया गया है। हर सैटेलाइट की अपनी खासियत है।
| सैटेलाइट/सेंसर | क्या काम करेगा? |
|---|---|
| MODIS (Terra और Aqua) | खेतों में सक्रिय आग का पता लगाना |
| VIIRS (NOAA-20) | अपेक्षाकृत बेहतर रिजॉल्यूशन के साथ आग की पहचान |
| Meteosat-8 और Meteosat-9 (SEVIRI) | लगभग हर 15 मिनट में निगरानी कर आग लगने का समय समझना |
| Sentinel-2 | आग के बाद खेतों की तस्वीरों से जले हुए क्षेत्र का अनुमान लगाना |
इनकी भूमिका को समझिए।
MODIS और VIIRS: ये आग से निकलने वाली गर्मी यानी थर्मल सिग्नल को पहचानते हैं। इससे पता चलता है कि किस इलाके में आग जैसी गतिविधि हुई है।
Meteosat-8 और Meteosat-9: ये जियोस्टेशनरी सैटेलाइट हैं। यानी पृथ्वी के मुकाबले लगभग एक ही क्षेत्र पर लगातार नजर रखते हैं। इनमें लगे SEVIRI सेंसर से करीब 15 मिनट के अंतराल पर तस्वीरें मिलती हैं। इससे पता लगाने में मदद मिलती है कि दिन के किस समय आग की गतिविधि सबसे ज्यादा होती है।
Sentinel-2: इसका काम थोड़ा अलग है। यह आग की लपटें गिनने के बजाय खेतों की जमीन में हुए बदलावों को पहचानने में मदद करता है। इसके लिए आग लगने के पहले और बाद की तस्वीरों की तुलना की जाती है।
इस तरह Fire Watch को आग की संख्या, समय और जले हुए क्षेत्र की अलग-अलग जानकारी मिलती है।
सरकारी आंकड़ों में पराली जलाने की घटनाएं इतनी कम कैसे हो गईं?
यह इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। पिछले कुछ वर्षों में सरकारी रिकॉर्ड में पराली जलाने की घटनाओं में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।
| साल | दर्ज पराली जलाने की घटनाएं |
|---|---|
| 2021 | करीब 80,000 |
| 2025 | करीब 6,000 |
इन आंकड़ों को देखकर लगता है कि पराली जलाने की समस्या काफी हद तक कम हो गई है। लेकिन iFOREST के मुताबिक, तस्वीर इतनी सीधी नहीं है।
संस्था की 2025 की स्टडी में कुछ अहम बातें सामने आईं:
पंजाब और हरियाणा में पारंपरिक सैटेलाइट से दर्ज आग की घटनाओं में भारी गिरावट आई।
कई बड़ी आग दोपहर 3 बजे के बाद लगती पाई गईं।
पारंपरिक सैटेलाइट की निगरानी के समय से बाहर होने के कारण ऐसी घटनाएं दर्ज होने से छूट सकती हैं।
आग की संख्या में कमी का मतलब यह जरूरी नहीं कि जलने वाले खेतों का क्षेत्रफल भी उसी अनुपात में घटा हो।
आग की संख्या और जले हुए खेतों का क्षेत्रफल अलग-अलग चीजें हैं।
मान लीजिए एक जिले में 100 जगह आग लगी और दूसरे जिले में 50 जगह। जरूरी नहीं कि पहले जिले में ही ज्यादा जमीन जली हो। दूसरे जिले में कम जगह आग लगी हो, लेकिन हर जगह बड़े क्षेत्र में पराली जलाई गई हो। यही वजह है कि केवल आग की गिनती के आधार पर पराली जलाने की समस्या का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता।
क्या भारत के पास अपना ऐसा सैटेलाइट नहीं है जो लगातार निगरानी कर सके?
भारत अंतरिक्ष तकनीक में बड़ी क्षमता रखता है। मौसम, कृषि, आपदा प्रबंधन और सीमाओं की निगरानी के लिए देश के पास कई तरह के सैटेलाइट हैं। लेकिन लगातार और बार-बार किसी खास क्षेत्र की निगरानी करने वाली जियोस्टेशनरी अर्थ ऑब्जर्वेशन क्षमता को और मजबूत करने की जरूरत है।
इसी मुद्दे पर 2026 में संसद की विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन संबंधी स्थायी समिति ने भी चिंता जताई थी। हालांकि, समिति की रिपोर्ट मुख्य रूप से हिमालयी क्षेत्र में जंगलों में लगने वाली आग की निगरानी पर थी, न कि विशेष रूप से पराली जलाने पर।
समिति ने कहा कि भारत फायर मॉनिटरिंग के लिए विदेशी सैटेलाइट प्रणालियों पर निर्भर है। इसने ऐसी स्वदेशी जियोस्टेशनरी सैटेलाइट प्रणाली विकसित करने की सिफारिश की, जो चौबीसों घंटे आग की निगरानी कर सके।
EOS-05 यानी GISAT-1A क्या है?
भारत के पास इस दिशा में अपनी तकनीक विकसित करने की क्षमता भी है। EOS-05 (GISAT-1A) इसी तरह का एक महत्वपूर्ण मिशन है।
इस सैटेलाइट को जियोस्टेशनरी ऑर्बिट में स्थापित करने के लिए सितंबर 2026 में लॉन्च किया गया। इसका उद्देश्य भारतीय उपमहाद्वीप की बार-बार तस्वीरें लेना और प्राकृतिक आपदाओं सहित जमीन पर होने वाले बदलावों की निगरानी करना है।
GISAT कार्यक्रम के लिए जारी डिजाइन संबंधी जानकारियों में कुछ विशेषताएं बताई गई हैं:
चुने हुए क्षेत्रों की करीब हर 5 मिनट में तस्वीर लेने की क्षमता।
साफ आसमान की स्थिति में पूरे भारतीय भूभाग को लगभग हर 30 मिनट में कवर करने की क्षमता।
जमीन और वनस्पति में होने वाले बदलावों की निगरानी।
लेकिन यहां एक जरूरी बात है। EOS-05 के ऑपरेशनल होने की स्थिति को लेकर उपलब्ध WMO रिकॉर्ड में सितंबर 2026 तक इसे कमीशनिंग चरण में बताया गया था। इसलिए इसे अभी पूरी तरह चालू और पराली निगरानी में इस्तेमाल हो रही प्रणाली बताना सही नहीं होगा।
आग बुझने के बाद भी सैटेलाइट कैसे पकड़ेगा पराली जलाने की घटना?
Fire Watch की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है Burnt Area Mapping। इस तकनीक में सिर्फ आग की लपटों को नहीं देखा जाता, बल्कि आग लगने के बाद जमीन पर हुए बदलावों की पहचान की जाती है।इसके लिए Sentinel-2 की तस्वीरों का इस्तेमाल किया जाता है।
इसे ऐसे समझिए:
सबसे पहले खेतों की आग लगने से पहले की सैटेलाइट तस्वीर ली जाती है।
फिर जलने के मौसम के बाद उसी इलाके की तस्वीर ली जाती है।
दोनों तस्वीरों की तुलना करके जमीन और वनस्पति में हुए बदलावों की पहचान की जाती है।
इन बदलावों के आधार पर जले हुए कृषि क्षेत्र का अनुमान लगाया जाता है।
इसके लिए NBR यानी Normalized Burn Ratio और dNBR जैसे तकनीकी पैमानों का इस्तेमाल किया जाता है।
इसका फायदा यह है कि अगर किसी खेत में आग लगी और सैटेलाइट ने उस समय आग की लपटें नहीं देखीं, तब भी बाद में जमीन पर मौजूद जलने के निशान से उस क्षेत्र की पहचान संभव हो सकती है।
हालांकि, हर बदलाव पराली जलने का प्रमाण नहीं होता। फसल कटाई, खेत की जुताई और दूसरी गतिविधियों से भी जमीन की तस्वीर बदल सकती है। इसलिए Burnt Area Mapping को भी सावधानी से समझना जरूरी है।
अब आग की गिनती नहीं, जले हुए खेतों का हिसाब भी जरूरी
पराली जलाने की समस्या से निपटने के लिए सिर्फ यह जानना पर्याप्त नहीं है कि कितनी जगह आग लगी। यह भी समझना जरूरी है कि आग कब लगी, कितनी देर तक लगी और कितनी जमीन को प्रभावित किया।
Fire Watch इसी कमी को दूर करने की कोशिश है। यह अलग-अलग सैटेलाइट के डेटा को मिलाकर पराली जलाने की अधिक व्यापक तस्वीर पेश करेगा।


































