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भारत के लोग भजन कीर्तन से दूर हो रहे हैं, लेकिन विदेशी इसे अपना रहे हैं

भारतीयों को अपनी सॉफ्ट पावर को समझना होगा!

TFI Desk द्वारा TFI Desk
6 August 2022
in चर्चित
india & europe

Source- Google

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मन ये सुनकर कितना गौरवान्वित हो जाता है, कितना प्रफुल्लित हो उठता हैं, ख़ुशी से नाचने लगता हैं कि हमारे देश के भक्ति संगीत का विस्तार यूरोपीय देशों में काफी तेजी से हो रहा है। हमारे देश का भजन-कीर्तन यूरोपीय देशों में अपने पैर पसार रहा हैं। वहीं दूसरी ओर हम अपने इन्हीं भजन-कीर्तन जैसे संगीतों से काफी हद तक दूर भाग गए हैं और पाश्चात्य के रॉक, पॉप, रैप संगीत के आदि हो गए हैं। साफ़ शब्दों में कहें तो हमारे भजन-कीर्तन ने पाश्चात्य की सभ्यता में ठीक उसी प्रकार एंट्री मार ली हैं। जैसे एक समय में हमारे देश में पाश्चात्य देशों अर्थात यूरोपीय देशों के संगीत रॉक, पॉप, रैप ने दस्तक देने की शुरुआत की थी।

बीते एक-दो सालों में हमारे लोकप्रिय कृष्ण और राम के भजन-कीर्तन को गाते हुए कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहें हैं। इन वीडियों में हरे रामा हरे कृष्णा, अच्युतमकेशवम जैसे हमारे भक्ति गीतों पर विदेशियों के द्वारा भजन-कीर्तन करते देखा जा रहा हैं। इन देशों में तो कई लोग अपने छोटे-छोटे ग्रुप या मण्डली बनाकर वहां के मंदिरों या चौक-चौराहों पर भजन कीर्तन कर रहें हैं। इनके ग्रुप में दो या दो से अधिक लोग होते हैं। इसमें पुरुष, महिलाएं और युवा भी शामिल हैं।

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इन लोगों के बीच राम और श्री कृष्ण भगवान काफी लोकप्रिय हैं। ये लोग ज्यादातर इनके ही भजन-कीर्तन गाते हैं और उनकी भक्ति में लीन रहते हैं। ये लोग अपने वीडियो अपने सोशल मीडिया एकाउंट्स पर भी अपलोड करते हैं। लेकिन ज्यादातर इनके ये वीडियो अन्य लोगों के द्वारा शेयर किए जाते हैं, जो बाद में लोकप्रिय हो जाते हैं। इन्हें हमारे जाने माने वाद्य यंत्रों तबला, वीणा, डमरू, पखावज आदि का प्रयोग कर कई बार भजन-कीर्तन गाते हुए देखा जाता हैं।

और पढ़ें: गयाना में सनातन धर्म – कहानी Western Hemisphere के सबसे बड़ी हिन्दू आबादी की

अच्युत गोपी कृष्ण भक्ति आंदोलन की शुरुआत की

अमेरिका में रहने वाली एक अच्युत गोपी एक आध्यात्मिक कंटेंट निर्माता हैं और ग्रैमी अवार्ड में नॉमिनेट कलाकार हैं, जिन्हें अपने कृष्ण भक्ति में गाये गये गीतों के लिए कई अवॉर्ड भी मिल चुके हैं। कृष्ण भक्ति में अपना जीवन अर्पण कर देने वाली अच्युत गोपी बताती हैं कि, “उनके जीवन का उद्येश्य कीर्तन के माध्यम से कृष्ण की भक्ति को घर-घर पहुंचाना है और विदेशों के लोगों को कृष्ण भक्ति का संदेश देना है। कृष्ण प्रेम में अच्युत गोपी अमेरिका के कई शहरों में कार्यक्रमों का आयोजन कर चुकी हैं।”

अच्युत गोपी कहती हैं “मैंने अब तक अपने जीवन में भक्ति गीतों और ध्यान-समाधि के कई आयोजन किए हैं और इन सभी ने मेरे जीवन को सकारात्मकता से भर दिया हैं, जिसकी वजह से मेरे जीवन में बहुत से सुधार हुए हैं।” अच्युत गोपी का ऑफिशियल इंस्टाग्राम भी है, जिस पर वह अपने कृष्ण भक्ति पर लिखे और गायें गीतों को अपलोड करती रहती हैं। इनके इंस्टाग्राम पर 28 हजार से ज्यादा फॉलोवर्स हैं। अगर बात पाश्चात्य में शुरुआत से करें तो हरे राम हरे कृष्ण संकीर्तन की शुरुआत साठ के दशक में इस्कॉन के संस्थापक स्वामी प्रभुपाद ने किया। स्वामी प्रभुपाद वैष्णव मत के संत थे और प्रयागराज में उनके गुरु स्वामी भक्ति सिद्धांतसरस्वती ने उन्हें आदेश दिया था कि “भविष्य में तुम्हें पश्चिम में जाकर भक्ति का प्रसार करना है।”

1960 में 70 साल की उम्र में वो अमेरिका गए और वहां कृष्ण भक्ति आंदोलन की शुरुआत की। पश्चिम में उन्होंने चैतन्य महाप्रभु के कीर्तन का मार्ग अपनाया और उनके इस आंदोलन के मूल में हरि नाम का संकीर्तन था। वो न्यूयार्क के पार्कों में जाते और हिप्पियों के बीच “हरे राम हरे कृष्ण” नाम का संकीर्तन करते। इस तरह शुरु हुआ उनका कृष्ण भक्ति मूवमेन्ट 1967 में इस्कॉन के रूप में सामने आया जो आज दुनिया के लगभग हर देश में मौजूद है। इस्कॉन का प्रमुख जोर हरि नाम संकीर्तन पर होता है। उनका सिर्फ एक मुख्य कार्य है और वह है हरि नाम संकीर्तन। पूरी दुनिया में इस्कॉन के अनुयायी नियमित हरे राम हरे कृष्ण नाम का कीर्तन करते है। उन्होंने इसे ही आंदोलन बना दिया है।

और पढ़ें: घट रही है हिंदुओं में प्रजनन दर, ऐसा ही रहा तो जल्द ही भारत में अल्पसंख्यक बन जाएंगे हिन्दू

यूरोपीय देश हमारे भजन-कीर्तन को अपना रहे और भारतीय दिन-प्रतिदिन दूर हो रहे है

जहां यूरोपीय देश हमारे भजन-कीर्तन से प्रभावित होकर हमारी भक्ति गीतों के सभ्यता में ढल रहें हैं। वहीं दूसरी ओर हम अपने पारम्परिक भक्ति संगीत भजन-कीर्तन से दिन-प्रतिदिन दूर भागते जा रहें हैं। कहाँ एक समय हमारी संगीत की पहचान भजन-कीर्तन से होती थी। लेकिन आज के परिवेश में स्थिति एकदम विपरीत हैं। क्योंकि हमारे देश के युवा पाश्चात्य देशों के रॉक, पॉप, रैप गानों के प्रति पागल हो चुके हैं। ये युवा विदेशों के संगीत तो सुनते ही हैं। साथ ही ये अपने देश के भी ऐसे ही गाने सुनते हैं जो रॉक, पॉप, रैप किस्म के हो। पिछले 10-15 सालों में भारत में इन गानों की मानों बाढ़ सी आ गयी हैं।

हनी सिंह, बादशाह, रफ़्तार, एमिवे जैसे रैपर ने देश के युवाओं को अपने गीतों के प्रति आकर्षित करने में सफल रहें। हर दिन रॉक, पॉप, रैप टाइप के गाने रिलीज होते रहते हैं। देश के युवा इसे यूट्यूब पर सुन-सुन कर हिट करा देते हैं। साउथ कोरियन बैंड बीटीएस के लिए भी भारत के युवा की दीवानगी अलग ही लेवल की हैं। लेकिन बीते दो सालों में कुछ ऐसे भक्ति गाने निकल कर आएं हैं, जिन्होनें फिर से भारत के युवाओं में भक्ति गानों के प्रति झुकाव पैदा किया। इन गानों में हंसराज रघुवंशी के ज्यादातर गाने जैसे- ओ भोलेनाथ जी, महादेवा, लागी लगन शंकरा। जुबिन नौटियाल के गाने जैसे- मेरे बाबा, मेरी माँ के बराबर काफी लोकप्रिय हुए हैं, जो हर एक के जुबान पर रहते हैं। हाल हीं में भगवान महादेव शंकर पर आया भजन ‘हर-हर शंभू’ ने तो आग लगा दी हैं। जहां देखों हर-हर शंभू की गूंज सुनाई देती हैं। हर सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर यह भजन आग की तरह फैला गया है। सभी लोग इस भजन को अपने स्टोरी-स्टेटस में जगह दे रहें हैं। इस भजन को ओडिशा की अभिलिप्सा पांडा ने गया है। यूट्यूब पर इस गीत को 72 मिलियन व्यूज मिल चुके हैं।

और पढ़ें: सनातन संस्कृति के त्योहार, जिनके बारे में हिंदुओं को अधिक जानने की आवश्यकता है

लेकिन असल मुद्दा ये हैं कि इन सभी गानों को पाश्चात्य शैली में गाया गया हैं। लेकिन इन सभी गानों में हमारे गायन की शैली गायब हैं। इन सब में वो बात नहीं दिखती हैं, जिनके लिए हमारी भक्ति भजन-कीर्तन जाने जाते हैं। इन सभी गानों में हमें हमारे वाद्य यंत्रों की धुन नहीं सुनाई देती हैं। कभी-कभी तो ऐसा प्रतीत होता हैं कि हम लाऊड संगीत के साथ कोई फ़िल्मी गीत सुन रहें हैं। वहीं हंसराज रघुवंशी के महादेव के गीतों में गांजा पीते हुए चित्र दिखाया जाता हैं।

जो हमारे युवा को उनके गीतों से ज्यादा आकर्षित करते हैं। चर्चित पॉप और रैप गायक मिलिंद गाबा का भोले नाथ नाम का एक गाना हैं, जिसमें भी ऐसे चित्र हैं। भक्ति अर्थात भगवान के नाम पर बनने वाले ऐसे भजन या गानों पर ऐसे गलत दृश्य कहीं से भी उचित नहीं हैं। ये हमारे देश व समाज के लिए कदापि सही नहीं हो सकता है। क्योंकि हमारे देश के युवा भक्ति गीतों से आकर्षित न होकर उसमें दिखाई जाने वाले तमाम गलत दृश्यों से आकर्षित हो जाते है।

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