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लोकतंत्र से परेशान नेपाल! क्या फिर से बनेगा हिंदू राष्ट्र? जानें समस्या और सियासत

Nepal Hindu Rashtra Protest: नेपाल की जनता आखिर लोकतंत्र से क्यों परेशान है? आइये जानें आखिर 17 साल बाद हिंदू राष्ट और राजशाही की मांग क्यों हो रही है।

Shyamdatt Chaturvedi द्वारा Shyamdatt Chaturvedi
10 April 2025
in विश्व
Nepal, Hindu Rashtra, Kathmandu, Democracy, Nepal Protest

Nepal Hindu Rashtra Protest In Kathmandu

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Nepal Hindu Rashtra Protest: पहाड़ियों और तराइयों में बसा नेपाल इन दिनों एक आंदोलन का सामना कर रहा है। काठमांडू की सड़कों से लेकर जनकपुर की गलियां पोस्टर-बैनर से भर गई हैं। आंदोलन सरकार की नीतियों, देश के बिगड़ते हालात, स्थिरता को लेकर हैं। आंदोलनकारियों को इन तमाम समस्याओं का हल अपनी पुरानी व्यवस्था में दिख रहा हैं। इसी कारण जनता ने 2008 राजशाही लोकतंत्र अपनाया और अब 17 साल बाद फिर राजशाही के लिए नारे लगा रही है। ऐसे में सवाल उठते हैं कि आखिर जनता फिर से देश को इकलौता हिंदू राष्ट्र (Nepal People Demand Hindu Rashtra) क्यों बनाना चाहती है? सेक्युलर नेपाल में जनता को क्या मिला? और हिंदू राष्ट्र कैसे बन सकता है?

साल 2006 में आंदोलन हुआ तो जनता चाहती थी लोकतंत्र आए और उन्हें जनता की चुनी सरकार मिले। जहां उनकी सरकार उनके लिए फैसले करें। हालांकि, महज 17 साल में जनता का लोकतंत्र से पेट भर गया। ऐसा नहीं कि ये नाराजगी लोकतंत्र से है। असल में जनता की ये नाराजगी देश के उन सियासी दलों से है जो जनता के मत को किनारे रखकर सत्ता के लिए कुछ भी कर सकते हैं। देश की एक बड़ी आबादी को हाशिये पर रखा गया। उन्हें धर्मांतरण, भ्रष्टाचार, सेक्युलर राष्ट्र के नाम पर पीछे धकेला गया।

लगातार आए धर्मांतरण के केस (Conversion in Nepal)

साल 2021 में नेपाल में जनगणना कराई गई थी। रिपोर्ट आई तो साफ हुआ कि एक समय जो देश हिंदू राष्ट्र हुआ करता था वहां हिंदुओं की आबादी कम हो रही है। ईसाई और मुस्लिम आबादी बढ़ रही है। जबकि, बौद्धों की संख्या में भी कमी आ रही है। इसके पीछे नेपाल में धर्मांतरण भी एक बड़ा कारण है। सितंबर 2024 में ही चर्च में धर्मांतरण का मामला सामने आया था। वहीं फरवरी 2025 में हिंदू संगठना के बवाल के बाद 17 लोगों को धर्मांतरण करने के आरोप में काठमांडू से गिरफ्तार किया गया था।

  • हिंदू धर्म में 0.11 फीसदी की कमी
  • बौद्ध धर्म में 0.79 फीसदी की कमी
  • इस्लाम में 0.69 फीसदी की वृद्धि
  • किरात धर्म में 0.17फीसदी की वृद्धि
  • ईसाई धर्म में 0.36 फीसदी की वृद्धि

लोगों ने बताई..समस्याएं और भी हैं (Nepal People Problems)

नेपाल की बड़ी आबादी को धर्मांतरण के अलावा भी कई समस्याओं का सामना करना पड़ा रहा है। भ्रष्टाचार के कारण देश में नौकरियों का सही विभाजन नहीं हो रहा है। अच्छे खासा पढ़े लिखे लोगों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है। वहीं अल्पसंख्यक सिंपैथी के दम पर उनसे आगे निकल रहे हैं। लेफ्ट की सरकार देश की संस्कृति का चाइना करण कर रही है। इससे भी लोगों में खासी नाराजगी है।

दैनिक भास्कर से बात करते हुए एक आंदोलनकारी ने कहा कि मैंने 2005 में लोकतंत्र के लिए आंदोलन (Hindu Rashtra Protest Nepal) किया था। अब राजशाही के लिए आंदोलन कर रहा हूं। मैंने दोनो राज देखे हैं। मुझे लगता है देश जब हिंदू राष्ट्र था, तब हम ज्यादा खुश थे। वहीं एक और आंदोलनकारी ने कहा कि पार्टियों से देश का भला होता तो हमें सड़कों पर नहीं उतरना पड़ता। हम इस व्यवस्था को बदलकर रहेंगे। जबकि, एक अन्य आंदोलनकारी ने कहा कि हमें फिर से हिंदू राष्ट्र ही चाहिए। लोग लोकतंत्र से नहीं उसकी खामियों से नाराज हैं। सही से लोकतंत्र (Democracy In Nepal) ले आते तो हमें ऐसा करने की जरूरत नहीं पड़ती। इन्होंने देश में अपने स्वार्थ के लिए भ्रष्टाचार फैला रखा है। बेरोजगारी चरम पर है।

17 साल में 14 सरकार

राजशाही के अंत के बाद नेपाल में 2008 में लोकतंत्र की नींव पड़ी थी। उसके बाद से तीन प्रमुख पार्टियां नेपाली कांग्रेस, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (UML) और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) चुनावों में बढ़कर हिस्सा ले रही हैं और सरकार बना रही है। हालांकि, अभी तक देश में 14 बार सरकार बदल चुकी है। लोकतंत्र आने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि उन्हें जनता का शासन देखने को मिलेगी। हालांकि, विरोधी हो या समर्थक सभी लोग आपस में मिलकर सरकार बना चुके हैं।

कभी एकमात्र हिंदू राष्ट्र था

नेपाल साल 2006 तक दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र (Hindu Rashtra) था। उस समय तक वहां राजशाही (Nepal People Demand Rajshahi) व्यवस्था हुआ करती थी। राजा को लोग भगवान विष्णु का अवतार तक मानते थे। देश के संविधान में भी हिंदू धर्म को “राष्ट्र धर्म” के रूप में स्वीकार किया गया था। हालांकि, 2006 में लोकतांत्रिक आंदोलन और माओवादी विद्रोह के कारण राजशाही समाप्त कर दी गई। नेपाल को इस आंदोलन के बाद धर्मनिरपेक्ष गणराज्य घोषित किया गया। साल 2015 में नया संविधान बनाया गया और इसे सेक्युलर राष्ट्र के रूप में स्वीकार कर लिया गया।

क्यों हो रही हिंदू राष्ट्र की मांग?

राजशाही के प्रति सहानुभूति: जनता के एक हिस्से में राजा को लेकर अब भी भरोसा है।
वामपंथी सरकारों से असंतोष: शासन से उपजी अस्थिरता और आर्थिक कठिनाइयों के कारण लोग परेशान हैं।

सियासी दलों की ‘तानाशाही’

अभी नेपाल की मौजूदा सरकार नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (UML) के लीडर केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में चल रही है। इनका गठबंधन नेपाली कांग्रेस के साथ है। इतिहास में दोनों दल एक दूसरे के विरोधी रहे हैं। हालांकि, इन्होंने सरकार बनाने के लिए गठबंधन कर लिया। यही कारण है कि लोग लोकतंत्र के खिलाफत में आ गए हैं। देश में हो रहे आंदोलन का समर्थन करने वाले तीनों पार्टियों के खिलाफ हैं।

क्या कहता है नेपाल का संविधान?

साल 2015 में बना नेपाल का संविधान देश को धर्मनिरपेक्ष बताता है। संविधान की धारा 4 कहती है कि नेपाल एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। हालांकि, इसी धारा में यह जोड़ा गया है कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ सांस्कृतिक और धार्मिक स्वतंत्रता का संरक्षण होगा।

हिंदू राष्ट्र का रास्ता आसान नहीं

नेपाल में तेजी से हिंदू राष्ट्र की मांग हो रही है। आंदोलन में शामिल लोगों का एक हिस्सा हिंदू राष्ट्र के साथ राजशाही का भी समर्थन कर रहा है। ऐसे में भविष्य में कोई बड़ा जनमत या जन आंदोलन होता है जिस कारण देश के राजनीतिक समीकरण बदलते जाएं तो संभव है कि देश हिंदू राष्ट्र बन जाए। हालांकि, इसके रास्ते में कई चुनौतियां भी हैं।

  • संविधान में संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत चाहिए।
  • राजनीतिक दलों में इस मुद्दे पर एकजुटता नहीं है।
  • मानवाधिकार संगठन धार्मिक पक्षपात वाली व्यवस्था के खिलाफ हैं।

संसद का सियासी गणित

नेपाल में आखिरी चुनाव साल 2022 में हुए थे। 275 सीटों वाली संसद में सरकार बनाने के लिए 138 सांसदों की जरूरत होती है। हालांकि, इस चुनाव में किसी को बहुमत हासिल नहीं हुआ। नेपाली कांग्रेस को 89, नेपाली कांग्रेस (UML) को 78 और CPN(MC) को 32 सांसद मिले थे। इसके अलावा RSP को 20, RPP को 14, JSP को 12, यूनिफाइड सोशलिस्ट को 10, जनमत पार्टी को 6 सांसद मिले थे।

सांसदों की संख्या के आधार पर देखा जाए तो नेपाल में 5वें नंबर का दल RPP खुलकर राजतंत्र की बहाली की बात कर रहा है। उनके पास पिछले चुनाव के आधार पर नेपाल में 5 फीसदी वोट हैं। पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह खुलकर तो इसका समर्थन नहीं करते हैं। हालांकि, पार्टी उनका पूरा समर्थन करती है।

सियासी दलों के लिए धर्म संकट

नेपाल की 80% से अधिक आबादी हिंदू है। इसके अलावा 20 फीसदी के आसपास बौद्ध, मुसलमान, किरात और ईसाई हैं। ऐसे में देश को हिंदू राष्ट्र बनाने का मुद्दा सियासी दलों के लिए केवल इमोशनल ही नहीं रणनीतिक भी है। अभी देश में चल रहे आंदोलन (Nepal Hindu Rashtra Protest) का अंत क्या होगा। इसे लेकर तो कुछ साफ नहीं कहा जा सकता है। हालांकि, एक बात साफ है कि सियासी दलों की मिली जुली सरकार से लोग परेशान हैं। वो चाहते हैं देश में स्थिरता के लिए उसका हिंदू राष्ट्र होना जरूरी है।

Tags: DemocracyHindu RashtraKathmanduNepalNepal Protest
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