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नक्सलवाद पार्ट-5: ग्रीन होता रेड कॉरिडोर! समावेशी विकास से कैसे लगी नक्सलवाद पर लगाम?

नक्सलवाद पार्ट-5: पिछले 11 साल में नक्सलियों पर कड़ी नकेल कसी गई है। हालांकि, ये हथियारों से एक्शन के साथ समावेशी विकास के कारण संभव हुआ है। आइये जानें इसके पडाओ?

Shyamdatt Chaturvedi द्वारा Shyamdatt Chaturvedi
31 May 2025
in भारत
Naxalism Part-5

Naxalism Part-5

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नक्सलवाद पार्ट-5: आजादी के दशकों बाद बुनियादी सुविधाएं जैसे सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य सेवाएं नक्सल इलाकों में नहीं पहुंची। कंपनियों को खनिज ब्लॉक देने के लिए आदिवासियों की भूमि छीनी गई। इन इलाकों से उठी राजनीतिक आवाजें अक्सर दबा दी गईं। वहीं सरकारी सह पर पुलिसिया दमन ने निर्दोष आदिवासियों को नक्सली बता दिया। इससे स्थानीय लोगों का गुस्सा फूटा। नक्सलियों ने इस गुस्से को हथियार बना लिया। सरकारी विफलता, सामाजिक असमानता के कारण उन्हें स्थानीय समर्थन मिलने लगा। इसी का परिणाम था कि खौफनाक रेड कॉरिडोर हम सबके सामने आया। हालांकि, साल 2014 के बाद से हुए कार्रवाई और चलाई गई योजनाओं के कारण अब ये सिकुड़ गया है।

नक्सलवाद पार्ट-4 में हमने रेड कॉरिडोर के पनपने के कारणों पर चर्चा की थी। अब हम आपको बताएंगे कि कैसे 2014 के बाद सरकार ने नक्सलियों पर प्रहार करते हुए आदिवासियों में लोकतंत्र का प्रति आस्था जगाई। जिसके परिणाम स्वरूप रेड कॉरिडोर सिकुड़ गया है।

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समावेशी विकास पर ध्यान

आदिवासी देश के विकास में रोड़ा नहीं बल्कि भारत के विकास का मजबूत हाथ हैं। नक्सलवाद को खत्म करने के लिए नक्सलियों पर प्रहार एक मात्र साधन नहीं है। इसके लिए जरूरी है कि इन इलाकों में विकास पहुंचाया जाए और आदिवासियों को भरोसे में लिया जाए। सरकार उनकी जरूरत, अधिकारों और सुविधाओं पर ध्यान दे। उसी को समझते हुए NDA के दौर में नक्सलियों पर हथियार का कार्रवाई करते हुए समावेशी विकास पर ध्यान दिया। नतीजा ये हुआ की कभी 200 जिलों तक फैला नक्सलवाद अब गिनती के जिलों में रह गया है।

कुछ ऐसे बना समावेशी प्लान

  • 2006 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इससे निपटने के लिए लेफ्ट विंग एक्ट्रिमिस्ट डिवीजन बनाया
  • 2009 में ऑपरेशन ग्रीन हंट चलाया गया। हालांकि, इसमें आदिवासियों के मरने का भी दावा किया जाता है।
  • 2014 में प्रधानमंत्री मोदी ने समझा की बंदूकें छुड़ाने के लिए मेहनत का आएगा। इसके बाद विकास योजनाएं बनी।
  • 2017 में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने नक्सल प्रभावित इलाकों के लिए 8 सूत्रीय समाधान एक्शन प्लान पेश किया।
  • 2024 में गृहमंत्री अमित शाह ने ऐलान कर दिया कि देश से मार्च 2026 तक लाल आतंक खत्म हो जाएगा।

मिशन मार्च 2026 पर हुआ काम

केंद्र सरकार 2014 के बाद से ही देश के लिए नक्सलवाद को बड़ा खतरा मान रही थी। इस कारण वो लगातार नक्सल प्रभावित राज्य सरकार के साथ मिलकर कई योजनाओं के साथ ही नक्सलियों के खात्मे के लिए काम करती रही। साल 2019 में जब देश में दूसरी बार मोदी प्रधानमंत्री बने तो इसमें और तेजी आई। इस कार्यकाल में गृह मंत्रालय अमित शाह के हाथों गया। एक ओर केंद्र सरकार और राज्य सरकार विकास के लिए काम कर रहीं थी। वहीं दूसरी ओर अमित शाह ने नक्सलवाद को खत्म करने का संकल्प ले लिया। उन्होंने मार्च 2026 तक देश को लाल आतंक से आजाद कराने का वादा किया था और इस ओर तेजी से काम करने लगे।

नक्सलवाद खत्म करने की योजनाएं

  • सुरक्षा संबंधी व्यय योजना: वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित राज्यों की क्षमता को मजबूत करने और उनसे प्रभावी ढंग से लड़ने में मदद करती है।
  • फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशनों की योजना: नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा को मजबूत करने के लिए किलेबंद पुलिस स्टेशन बनाए गए हैं।
  • समाधान पहल योजना: नक्सलियों से लड़ने के लिए एक 8-सूत्रीय रणनीति है। इसमें सुरक्षा, विकास, वनवासी अधिकार और जनअवबोधन प्रबंधन है।
  • आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति: नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने और उन्हें नकद इनाम और पुनर्वास सहायता प्रदान की जाती है।
  • पुलिस ढांचे का आधुनिकीकरण: पुलिस बलों को बेहतर उपकरण और प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है ताकि वे प्रभावी ढंग से काम कर सकें।

समाधान एक्शन प्लान

वामपंथी उग्रवाद यानी नक्सलवाद के खिलाफ बहुआयामी रणनीति पर काम किया गया। सुरक्षा, विकास और अधिकार-आधारित सशक्तिकरण पर सरकार ने फोकस किया। इससे नक्सलवाद से प्रभावित इलाकों का परिदृश्य बदल गया है। राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक प्रतिबद्धता और लोगों की भागीदारी इसके खात्मे के लिए काम आई। इससे अब देश वामपंथी उग्रवाद मुक्ति की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है।

आदिवासी विकास की योजनाएं

  • विशेष केंद्रीय सहायता योजना के जरिए नक्सल प्रभावित जिलों को वित्तीय सहायता दी गई।
  • प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के जरिए कनेक्टिविटी में सुधार किया गया।
  • जंगली इलाकों में मोबाइल टावर स्थापित किए गए। इससे प्रभावी संचार बढ़ा।
  • वित्तीय समावेशन के लिए भारी संख्या में बैंक शाखाएं और एटीएम खोले गए।
  • युवाओं को रोजगार योग्य बनाने के लिए कौशल विकास योजनाएं चलाई गईं।
  • प्रधानमंत्री वनबंधु कल्याण योजना आदिवासी समुदाय के सामाजिक-आर्थिक स्तर को सुधारा।
  • वन धन विकास योजना के जरिए आदिवासी समुदायों को आजीविका कमाने और उद्यमी बनने का मौका दिया।
  • एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय के जरिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान की गई।
  • जनजातीय छात्रों के लिए छात्रवृत्तियां दी गई। इससे उनके उच्च शिक्षा में सुधार आया।
  • वन अधिकार अधिनियम के जरिए वनवासियों के अधिकारों और हकदारियों को सुनिश्चित किया गया।
  • छत्तीसगढ़ में नियद नेल्लानार योजना में मुफ्त बिजली, राशन और अन्य बुनियादी सुविधाएं दी गईं।

मिट्टी में मिलाए गए नक्सली

वर्ष 2024 में नक्सल विरोधी अभियान में प्राप्त सफलता को लगातार आगे बढ़ाया गया। इसी कारण वर्ष 2025 में भी सुरक्षाबलों को बड़ी कामयाबी मिली है। 4 महीने में 200 से ज्यादा हार्डकोर नक्सलियों को न्यूट्रलाइज़्ड कर दिए गए हैं। वहीं नाइट लैंडिंग हेलीपैड, फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशन आदि का निर्माण किया गया है जिस कारण सुरक्षा बलों के लिए काम करना आसान हुआ है।

  • मुठभेड़ में मारे गए नक्सलियों की संख्या 63 से बढ़कर 2089 तक पहुंच गई है।
  • 2024 में 928 और 2025 के पहले 4 महीनों में अब तक 718 सरेंडर हो चुके हैं।
  • 2019 से 2025 के दौरान कुल 320 कैंप नक्सल प्रभावित राज्यों में स्थापित किए हैं।
  • 68 नाइट लैंडिंग हेलीपैड बनाए गए हैं।
  • फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशन की संख्या जो 2014 में 66 थी वो अब 555 हो गई है।

सिकुड़ गया नक्सलियों का आतंक

साल 2007 में देश के करीब 200 जिले नक्सलवाद से प्रभावित थे। इनकी संख्या साल 2017 में घटकर 90 के आसपास आ गए। अब अप्रैल 2024 में ये संख्या घटकर 38 पर आ गई है। पहले 18 हजार वर्ग किलोमीटर का नक्सल प्रभावित इलाका देश में था। अब ये 4200 किलोमीटर तक सिमट गया है। अधिक प्रभावित जिलों की संख्या 12 से घटकर 6 हो गई है। इसमें छत्तीसगढ़ बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर और सुकमा का नाम है। वहीं झारखंड का एक पश्चिमी सिंहभूम और महाराष्ट्र का एक गढ़चिरौली शामिल है। वहीं पिछले 10 साल में 8,000 से अधिक नक्सलियों ने हिंसा का रास्ता छोड़ दिया है। इस कारण नक्सल घटनाओं में भी कमी आई है।

  • 2010 में 1936 घटनाएं हुईं थी।
  • 2024 में संख्या घटकर 374 हो गई है।
  • कुल मिलाकर 81 प्रतिशत की कमी आई है।
  • जवान, नागरिकों की मौत 85 फीसदी कम हुई है।
  • 2010 में 1005 मौतों का आंकड़ा 2024 में 150 हो गया है।

समानांतर सरकार की कमर तोड़ी

करीब 60 साल में नक्सलियों ने आदिवासी इलाकों में पैठ बना ली थी। घने जंगल और पहाड़ी इलाके इन्हें सेना और पुलिस से बचा रहे थे। दूसरी ओर इलाकों की सामाजिक संरचना ने उन्हें विस्तार का बल दिया। अनुसूचित जनजातियां और आदिवासी अशिक्षा और गरीबी से जूझ रहे थे। इसका लाभ लेते हुए नक्सलियों ने ‘जनताना सरकार’ की तर्ज पर समानांतर शासन शुरू कर दिया था। वो लगातार जबरन वसूली, खनिज और लकड़ी की तस्करी करते थे। हालांकि, पिछले 11 साल में सरकार ने इस पूरे तंत्र को तोड़ने का काम किया है। इलाकों में विकास का रास्ता आसान किया गया है। इससे आदिवासियों में लोकतंत्र के प्रति आस्था जागी है।

  • 14681 किलोमीटर की सड़कें बनाई गईं।
  • 178 एकलब्य मॉडल आवासीय विद्यालय खोले गए।
  • 48 ITI और 61 स्किल डेवलपमेंट सेंटर स्थापित हुए।
  • 1007 बैंक, 937 ATM और 5731 पोस्ट ऑफिस खुले।

नक्सलवाद पर सीरीज और अन्य नक्सली खबरों के लिए यहां क्किल करें।

एक्शन के साथ समावेशी विकास से अंत

रेड कॉरिडोर भौगोलिक बेल्ट बस नहीं है। ये आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक उपेक्षा का जीवंत दस्तावेज है। यह साबित करता है कि देश के आजाद होने के बाद भी लोकतंत्र और विकास देश के अंतिम छोर तक नहीं पहुंची। इस कारण हताश परेशान लोगों को देश के खिलाफ बरगलाना आसान हो गया। नतीजा ये हुआ की जंगलों में बंदूकें गूंजने लगीं। अब वर्षों तक अथक प्रयास और कोशिश के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने इसे सिकुड़ने पर मजबूर कर दिया है। इससे साफ होता है कि नक्सलियों के खात्मे के लिए केवल हथियारों की कार्रवाई नहीं बल्कि ग्राम स्वराज, शिक्षा और समावेशी विकास की जरूरत है।

Tags: NaxalismNaxalitesRed CorridorRed Terrorनक्सलवादनक्सलीरेड कॉरिडोरलाल आतंक
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