दिल्ली का जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय (JMI), जो अपनी शैक्षणिक उत्कृष्टता और वैचारिक सक्रियता के लिए जाना जाता है, इन दिनों एक नए और अनोखे विवाद के केंद्र में है। विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा आयोजित ‘युवा कुंभ’ कार्यक्रम के दौरान वाइस चांसलर प्रोफेसर मजहर आसिफ ने एक ऐसा बयान दिया जिसने सोशल मीडिया से लेकर कैंपस की गलियों तक हलचल मचा दी है। उन्होंने सनातन संस्कृति की प्रशंसा करते हुए कहा कि तमाम विविधताओं के बावजूद सभी भारतीयों का डीएनए ‘महादेव का डीएनए’ है। उनके इस संबोधन का वीडियो वायरल होने के बाद जहां एक ओर सांस्कृतिक एकता की बात हो रही है, वहीं दूसरी ओर छात्र संगठनों के विरोध ने विश्वविद्यालय के माहौल को गरमा दिया है।
‘युवा कुंभ’ और वीसी का स्वागत: वैचारिक मेल या नया विवाद?
राजधानी दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया में मंगलवार को आरएसएस के ‘युवा कुंभ’ का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के वीसी प्रोफेसर मजहर आसिफ ने न केवल शिरकत की, बल्कि मंच से आरएसएस नेताओं का गर्मजोशी से स्वागत भी किया। उन्होंने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि सनातन संस्कृति दुनिया की सबसे श्रेष्ठ संस्कृतियों में से एक है क्योंकि यह संकुचित विचारधारा के बजाय ‘सबके हित’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की बात करती है।
शिव परिवार का उदाहरण: अनेकता में एकता का अद्भुत दर्शन
प्रोफेसर मजहर आसिफ ने अपने भाषण के दौरान समाज में सद्भाव और सह-अस्तित्व को समझाने के लिए भगवान शिव के परिवार का एक बेहद दिलचस्प और प्राकृतिक उदाहरण पेश किया। उन्होंने कहा कि महादेव का परिवार विविधता के बीच एकता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
- विरोधाभास के बीच संतुलन: वीसी ने समझाया कि भगवान शंकर के गले में सांप है, जबकि उनके पुत्र गणेश जी की सवारी चूहा है। वहीं, माता पार्वती का वाहन शेर है और शंकर जी के सामने नंदी (बैल) विराजते हैं। कार्तिकेय जी की सवारी मोर है।
- प्राकृतिक शत्रुता और शांति: वैज्ञानिक और प्राकृतिक दृष्टि से देखें तो सांप चूहे को खाता है, मोर सांप का शिकार करता है और शेर नंदी का। ये सभी जीव स्वभाव से एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन हैं, लेकिन महादेव के सानिध्य में ये सभी अपनी शत्रुता भूलकर एक ही स्थान पर शांतिपूर्वक रहते हैं।
प्रोफेसर आसिफ के अनुसार, यह हमें संदेश देता है कि भारत जैसे देश में जहाँ अलग-अलग जाति, धर्म और समुदायों के लोग रहते हैं, वे भी इसी तरह मिलजुल कर रह सकते हैं। यही वह मूल्य है जो सनातन संस्कृति हमें सदियों से सिखाती आ रही है।
“हम सब भारतीय हैं, क्योंकि हमारे डीएनए में महादेव हैं”
भाषण का सबसे चर्चित हिस्सा वह था जब प्रोफेसर आसिफ ने भारतीयता की पहचान को जेनेटिक और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ दिया। उन्होंने सभागार में बैठे लोगों की ओर इशारा करते हुए कहा कि मुमकिन है कि यहाँ मौजूद हर व्यक्ति की मातृभाषा, खान-पान और परंपराएं अलग हों। लेकिन ये विविधताएं हमारी पहचान को बांटती नहीं हैं, बल्कि समृद्ध करती हैं। उन्होंने जोर देकर कहा, “हम सब सबसे पहले भारतीय हैं और हम भारतीय इसलिए हैं क्योंकि हम सभी का डीएनए ‘महादेव का डीएनए’ है।” उनके इस बयान को भारतीय पहचान की एक नई और सांस्कृतिक परिभाषा के रूप में देखा जा रहा है।
कैंपस में तनाव: छात्र संगठनों का उग्र विरोध और पुलिस का पहरा
एक ओर जहाँ वीसी के बयान की चर्चा हो रही थी, वहीं कैंपस का माहौल विरोध की आग में झुलस रहा था। ‘युवा कुंभ’ और आरएसएस की उपस्थिति का भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (NSUI) और कई अन्य वामपंथी छात्र संगठनों ने कड़ा विरोध किया। छात्रों का आरोप है कि विश्वविद्यालय के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को बदलने की कोशिश की जा रही है। किसी भी हिंसक टकराव की स्थिति को टालने के लिए प्रशासन ने पहले ही कैंपस के बाहर भारी मात्रा में दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती कर दी थी। विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने नारेबाजी की, लेकिन पुलिस की मुस्तैदी के कारण कार्यक्रम संपन्न हो सका।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और शैक्षणिक संस्थान: एक नई दिशा?
प्रोफेसर मजहर आसिफ का यह बयान केवल एक व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि जामिया जैसे संस्थान में हो रहे वैचारिक बदलाव का संकेत भी माना जा रहा है। उनके समर्थकों का कहना है कि उन्होंने धर्मों से ऊपर उठकर एक साझा भारतीय पहचान की बात की है, जबकि आलोचकों का मानना है कि यह शिक्षा के भगवाकरण की ओर एक कदम है। बहरहाल, ‘महादेव का डीएनए’ वाला यह बयान आने वाले समय में दिल्ली की राजनीति और बौद्धिक विमर्श का एक बड़ा मुद्दा बना रहेगा।































