रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच यूक्रेन को अपनी वायु शक्ति मजबूत करने के लिए बड़ी सफलता मिली है। स्वीडन और यूक्रेन के बीच हुए समझौते के तहत स्टॉकहोम यूक्रेन को 16 पुराने Gripen C/D लड़ाकू विमान दान करेगा, जबकि कीव 20 नए Gripen E/F विमानों की खरीद करेगा। इस सौदे की कुल कीमत करीब 2.5 अरब यूरो बताई जा रही है। यदि सब कुछ योजना के अनुसार रहा तो यूक्रेन को पहले ग्रिपेन विमान 2027 की शुरुआत तक मिल सकते हैं।
क्या है ग्रिपेन फाइटर जेट की खासियत?
स्वीडन द्वारा विकसित ग्रिपेन को दुनिया के सबसे बहुउपयोगी लड़ाकू विमानों में गिना जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह केवल एयरबेस ही नहीं, बल्कि छोटे रनवे और यहां तक कि हाईवे से भी उड़ान भर सकता है। युद्ध की स्थिति में यह क्षमता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि दुश्मन के लिए एयरबेस को निशाना बनाना आसान होता है।
ग्रिपेन का रखरखाव भी अपेक्षाकृत आसान है। इसे कम समय में फिर से ईंधन भरकर और हथियारों से लैस कर दोबारा मिशन पर भेजा जा सकता है। यही वजह है कि कई रक्षा विशेषज्ञ इसे लंबे संघर्ष वाले क्षेत्रों के लिए आदर्श विमान मानते हैं।
रूस के खिलाफ कैसे होगा इस्तेमाल?
यूक्रेन की योजना इन विमानों को सीधे डॉगफाइट के लिए नहीं बल्कि अपने एयर डिफेंस नेटवर्क को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल करने की है। ग्रिपेन अत्याधुनिक Meteor मिसाइलों से लैस हो सकता है, जिनकी मारक क्षमता लगभग 200 किलोमीटर तक मानी जाती है।
यूक्रेन का मानना है कि इन मिसाइलों की मदद से रूस के लड़ाकू विमानों को सीमा से काफी दूर रहने पर मजबूर किया जा सकता है, जिससे रूसी ग्लाइड बम हमलों की प्रभावशीलता कम हो सकती है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह सौदा?
भारत के नजरिए से यह विकास इसलिए अहम है क्योंकि ग्रिपेन लंबे समय से भारतीय वायुसेना के संभावित लड़ाकू विमान विकल्पों में चर्चा का विषय रहा है। हालांकि भारत ने हाल के वर्षों में स्वदेशी HAL Tejas और Rafale जैसे प्लेटफॉर्म पर अधिक ध्यान दिया है, लेकिन ग्रिपेन की कम परिचालन लागत, आसान रखरखाव और हाईवे ऑपरेशन जैसी क्षमताएं भारतीय रक्षा विशेषज्ञों की रुचि का विषय रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यूक्रेन में ग्रिपेन का प्रदर्शन भविष्य में दुनिया भर की वायु सेनाओं के लिए एक महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय बनेगा। यदि यह विमान युद्धक्षेत्र में प्रभावी साबित होता है, तो इससे वैश्विक रक्षा बाजार में इसकी मांग बढ़ सकती है और भारत जैसे देशों के लिए भी इससे महत्वपूर्ण रणनीतिक सबक निकल सकते हैं।

































