दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन करने पहुंचे CJP नेताओं की हिरासत और फिर एक साल तक शांति बनाए रखने की शर्त पर रिहाई ने एक बड़ा संवैधानिक सवाल खड़ा किया है। क्या पुलिस किसी संभावित गड़बड़ी की आशंका में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले सकती है? क्या ₹50 हजार का बॉन्ड भरने के बाद कोई नेता सरकार या चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन नहीं कर सकता? और अगर वह दोबारा जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने पहुंचता है, तो क्या उसे बॉन्ड तोड़ने का दोषी माना जाएगा?
इस पूरे मामले को समझने के लिए संविधान में मिले विरोध के अधिकार और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के उन प्रावधानों को समझना जरूरी है, जिनका इस्तेमाल CJP नेताओं के मामले में किया गया।
क्या CJP नेता दोबारा जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर सकते हैं?
सिर्फ एक साल तक शांति बनाए रखने का बॉन्ड भरने से शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार अपने आप खत्म नहीं हो जाता। उपलब्ध रिपोर्टों में तीनों नेताओं की रिहाई की शर्त शांति और अच्छे व्यवहार को बनाए रखने से जुड़ी बताई गई है। रिपोर्टों में ऐसा स्पष्ट नहीं है कि उन्हें एक साल तक किसी भी तरह के विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने से प्रतिबंधित कर दिया गया है। हालांकि, इस संबंध में अंतिम निष्कर्ष के लिए मजिस्ट्रेट के आदेश और बॉन्ड की वास्तविक शर्तों को देखना जरूरी है।
इसलिए अगर CJP नेता दोबारा जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करना चाहते हैं, तो उन्हें आयोजन स्थल के लिए लागू नियमों और पुलिस की अनुमति संबंधी प्रक्रियाओं का पालन करना होगा। यदि प्रदर्शन शांतिपूर्ण है और बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन नहीं करता, तो सिर्फ विरोध करने की वजह से उसे अपने आप शांति भंग करना नहीं माना जा सकता।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। अगर किसी प्रदर्शन के दौरान हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान, पुलिस के काम में बाधा या कोई अन्य गैरकानूनी गतिविधि होती है, तो उसके लिए कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है। यह तय करने के लिए कि बॉन्ड का उल्लंघन हुआ है या नहीं, उसकी वास्तविक शर्तें और संबंधित परिस्थितियां महत्वपूर्ण होंगी।
₹50 हजार के बॉन्ड का मतलब क्या है?
बॉन्ड को साधारण भाषा में भविष्य में शांति बनाए रखने की कानूनी प्रतिबद्धता समझ सकते हैं। इस मामले में पुलिस के अनुसार, तीनों नेताओं ने एक साल तक शांति और अच्छा व्यवहार बनाए रखने के लिए ₹50 हजार का बॉन्ड भरा।
यहां तीन बातें महत्वपूर्ण हैं ।पहली, ₹50 हजार का मतलब यह नहीं है कि नेताओं ने ₹50 हजार का जुर्माना भर दिया है। बॉन्ड और जुर्माना अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाएं हैं।
दूसरी, बॉन्ड की राशि और जमानतदार की भूमिका एक जैसी नहीं होती। पुलिस ने इसे जमानती बॉन्ड बताया है, जबकि कुछ रिपोर्टों में व्यक्तिगत बॉन्ड का भी उल्लेख है। इसलिए आदेश की प्रति देखे बिना यह निश्चित रूप से कहना सही नहीं होगा कि राशि जमा कराई गई थी, केवल भुगतान की गारंटी दी गई थी या व्यक्तिगत बॉन्ड स्वीकार किया गया था।
तीसरी, बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन होने पर कानूनी परिणाम हो सकते हैं। लेकिन केवल किसी सरकार, अधिकारी या संवैधानिक संस्था की आलोचना करने या शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने को अपने आप बॉन्ड का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। इसके लिए लागू शर्तों और कथित उल्लंघन के तथ्यों को देखना होगा।
BNSS की धारा 126 क्या कहती है?
CJP नेताओं के मामले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 का इस्तेमाल किया गया। यह प्रावधान शांति बनाए रखने के लिए सुरक्षा बॉन्ड से संबंधित है।
इस धारा के तहत, यदि कार्यकारी मजिस्ट्रेट को ऐसी सूचना मिलती है कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है, सार्वजनिक शांति को प्रभावित कर सकता है या कोई गलत कार्य कर सकता है, तो वह उस व्यक्ति से यह कारण बताने को कह सकता है कि उसे शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने का आदेश क्यों न दिया जाए। कानून में निर्धारित प्रक्रिया के तहत ऐसा बॉन्ड अधिकतम एक साल की अवधि के लिए हो सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि पुलिस या प्रशासन किसी व्यक्ति के बारे में केवल आशंका जताकर उसके सभी नागरिक अधिकार खत्म कर सकते हैं। यह एक निवारक कानूनी व्यवस्था है, जिसके इस्तेमाल में संबंधित कानूनी आधार और प्रक्रिया महत्वपूर्ण हैं।
सबसे अहम बात: धारा 126 का उद्देश्य शांति बनाए रखना है, न कि सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाले हर व्यक्ति को प्रदर्शन से दूर रखना। किसी मामले में इस प्रावधान का इस्तेमाल उचित था या नहीं, यह उपलब्ध तथ्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर तय होगा।
BNSS की धारा 170 में पुलिस को क्या अधिकार है?
इस मामले में पुलिस ने BNSS की धारा 170 का भी इस्तेमाल किया। यह प्रावधान किसी संज्ञेय अपराध को होने से रोकने के लिए निवारक गिरफ्तारी से संबंधित है।
इसका इस्तेमाल तभी किया जा सकता है जब कानून में निर्धारित परिस्थितियां मौजूद हों और पुलिस अधिकारी को लगे कि संज्ञेय अपराध को अन्य तरीके से रोका नहीं जा सकता। यह किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक हिरासत में रखने का सामान्य अधिकार नहीं है। धारा 170 के तहत की गई गिरफ्तारी में 24 घंटे से अधिक हिरासत जारी रखने के लिए कानून के अनुरूप अतिरिक्त आधार और अनुमति की जरूरत होती है।
CJP नेताओं के वकील ने मीडिया रिपोर्टों में कहा कि पुलिस आगे की हिरासत के पर्याप्त आधार नहीं दे सकी। पुलिस का पक्ष यह रहा कि निवारक कार्रवाई उचित प्रक्रिया के तहत की गई। इन दोनों पक्षों के दावों को अलग-अलग समझना चाहिए; हिरासत की वैधता पर कोई अंतिम निष्कर्ष निकालने के लिए संबंधित रिकॉर्ड और आदेश देखना जरूरी होगा।
क्या संविधान प्रदर्शन करने का अधिकार देता है?
हां। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत बिना हथियार शांतिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार मिलता है।
लेकिन ये अधिकार असीमित नहीं हैं। संविधान सार्वजनिक व्यवस्था सहित निर्धारित आधारों पर उचित प्रतिबंधों की अनुमति देता है। इसका मतलब है कि प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठा सकता है, लेकिन प्रतिबंध का कानूनी आधार होना चाहिए और कार्रवाई परिस्थितियों के अनुपात में होनी चाहिए।
जंतर-मंतर जैसे निर्धारित प्रदर्शन स्थलों पर भी स्थानीय नियम और अनुमति की शर्तें लागू हो सकती हैं। इसलिए प्रदर्शन का संवैधानिक अधिकार होने का मतलब यह नहीं कि कोई भी व्यक्ति किसी भी जगह, किसी भी समय और किसी भी तरीके से प्रदर्शन कर सकता है। उसी तरह, अनुमति न मिलने या शांति भंग होने की आशंका का हवाला देना भी हर परिस्थिति में मनमानी कार्रवाई का स्वतः औचित्य नहीं बन जाता।
पुलिस कब रोक सकती है और कब उठते हैं सवाल?
यदि प्रशासन के पास हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या किसी संज्ञेय अपराध की विश्वसनीय आशंका के ठोस आधार हैं, तो वह कानून के मुताबिक निवारक कदम उठा सकता है। वह प्रदर्शन के स्थान, समय, संख्या और तरीके को नियंत्रित करने के लिए लागू नियमों का सहारा भी ले सकता है।
दूसरी ओर, यदि कोई प्रदर्शन शांतिपूर्ण है, तो केवल सरकार या किसी संवैधानिक पदाधिकारी के खिलाफ नारे लगाने अथवा इस्तीफे की मांग करने के कारण उसे गैरकानूनी नहीं माना जा सकता। कार्रवाई की वैधता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रतिबंध किस कानूनी प्रावधान के तहत लगाया गया, उसके समर्थन में क्या आधार थे और क्या कम कठोर उपायों से स्थिति संभाली जा सकती थी।


































