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औरंगज़ेब को लेकर क्या थी जवाहरलाल नेहरू की राय?

विश्व हिंदू परिषद ने औरंगज़ेब की कब्र हटाने की मांग को लेकर नागपुर में एक रैली निकाली, जिसके बाद वहां तनाव बढ़ गया और दंगे भड़क उठे थे

Shiv Chaudhary द्वारा Shiv Chaudhary
20 March 2025
in इतिहास
औरंगज़ेब को लेकर क्या थी जवाहरलाल नेहरू की राय?
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मुगल आक्रांता औरंगज़ेब इन दिनों देश में राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है। विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने औरंगज़ेब की कब्र हटाने की मांग को लेकर नागपुर में एक रैली निकाली, जिसके बाद वहां तनाव बढ़ गया और दंगे भड़क उठे। एक वर्ग विशेष के लोग मजहब के नाम पर उन्माद फैलाने वाले विदेशी आक्रांता में अपना मसीहा ढूंढ रहे हैं और भारत के कुछ राजनीति दल भी उनकी बातों का समर्थन कर रहे हैं। कांग्रेस के कई नेताओं ने भी औरंगज़ेब की ‘तारीफ’ में कसीदे पढ़े हैं। औरंगज़ेब ने हिंदुओं पर अत्याचार से लेकर मंदिरों तोड़ने तक जो किया वो तथ्य किसी से छिपे नहीं हैं। देश के पहले प्रधानमंत्री और कांग्रेस के अध्यक्ष रहे जवाहरलाल नेहरू ने औरंगज़ेब को लेकर क्या कहा था, यह ना केवल कांग्रेस बल्कि औरंगज़ेब के समर्थक अन्य राजनीतिक दलों को जानना बेहद ज़रूरी है।

औरंगज़ेब पर क्या बोले नेहरू?

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध किताब ‘भारत की खोज’ (Discovery of India) में औरंगज़ेब के काल का ज़िक्र किया है। नेहरू ने इस किताब को मूल रूप से अंग्रेज़ी में स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में 1944 में अहमदनगर के किले में अपने 5 महीने के कारावास के दिनों में लिखा था जो 1946 में प्रकाशित हुई थी। इस किताब में नेहरू ने सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर भारत की आज़ादी से पहले तक की भारत की संस्कृति, धर्म और उसके जटिल अतीत का वर्णन किया है।

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नेहरू ने इस किताब में मुगल काल को लेकर विस्तार से लिखा है और उनके कई कृत्यों की तारीफ भी की है। हालांकि, इस पुस्तक में उन्होंने औरंगज़ेब की जमकर आलोचना करते हुए उसे धर्मांध और मंदिर तोड़ने वाला बताया है। नेहरू ने लिखा, “औरंगज़ेब अपने वर्तमान समय को तो ठीक तरह समझ ही नहीं पाया, वह अपने से तत्काल-पूर्व के समय को भी नहीं समझ सका। वह समय के विपरीत चलने वाला था और अपनी सारी योग्यता और उत्साह के बावजूद उसने अपने पूर्वजों के द्वारा किए गए कामों पर पानी फेरने का प्रयास किया था।”

‘भारत की खोज’ में नेहरू आगे लिखते हैं, “वह (औरंगज़ेब) धर्मांध और कठोर नैतिकतावादी था। उसे कला या साहित्य से कोई प्रेम नहीं था। हिंदुओं पर पुराना, घृणित जजिया कर लगाकर और उनके बहुत से मंदिरों को तुड़वाकर उसने अपनी प्रजा के बहुत बड़े हिस्से को नाराज़ कर दिया था।” नेहरू लिखते हैं, “औरंगज़ेब ने उन अभिमानी राजपूतों को भी नाराज़ कर दिया जो मुगल साम्राज्य के अवलंब और स्तंभ थे। उत्तर में सिख उठ खड़े हुए। वे हिंदू और मुस्लिम विचारों का किसी हद तक समन्वय करने वाले शांतिप्रिय समुदाय के प्रतिनिधि थे जो दमन और अत्याचार के विरुद्ध एक सैनिक बिरादरी के रूप में संगठित हो गए। भारत के पश्चिमी समुद्र तट पर उसने प्राचीन राष्ट्रकूटों के वंशज लड़ाकू मराठों को क्रुद्ध कर दिया, ठीक ऐसे समय जब उनके बीच एक अद्भुत सेनानायक उठ खड़ा हुआ था।”

मुगल साम्राज्य के पतन को लेकर नेहरू ने लिखा, “मुगल शासक तब तक ताकतवर रहे जब तक वे देश की संस्कृति के अनुरूप चलते रहे और एक साझा राष्ट्रीयता और विभिन्न समुदायों के मेलजोल के लिए काम करते रहे। लेकिन जब औरंगज़ेब ने इस दिशा के खिलाफ जाकर इसे दबाने की कोशिश की और खुद को एक भारतीय शासक से ज्यादा एक मुस्लिम शासक के रूप में पेश किया तब मुगल साम्राज्य कमजोर होने लगा। अकबर और उनके कुछ उत्तराधिकारियों द्वारा बनाए गए संतुलन को औरंगज़ेब ने खत्म कर दिया। मुगल शासकों को भारतीय राष्ट्रीय शासक माना जाता था, हालांकि औरंगज़ेब के मामले में इस पर मतभेद था।”

नेहरू ने ‘Glimpses of World History’ (विश्व इतिहास की एक झलक) पुस्तक में भी औरंगज़ेब का ज़िक्र किया है। यह किताब नेहरू द्वारा द्वारा अपनी बेटी इंदिरा गांधी को लिखे गए 196 पत्रों का संकलन है। नेहरू ने 9 सितंबर 1932 के एक पत्र में लिखा, “औरंगज़ेब के शासनकाल में हिंदुओं को दबाने की कोशिश की गई, जिसमें उनके मंदिरों को तोड़ना और नापसंद किए जाने वाले जज़िया कर को दोबारा लागू करना शामिल था।” इस पुस्तक में अन्य जगहों पर नेहरू ने लगभग वैसी ही बातें लिखी हैं जैसी ‘भारत की खोज’ में लिखी गई हैं।

जवाहरलाल नेहरू की नज़र में औरंगज़ेब एक ऐसा शासक था जिसने अपने कट्टरपंथी रवैये से भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को नुकसान पहुंचाया था। वे मानते थे कि भारत की ताकत उसकी विविधता में निहित है, जिसे औरंगज़ेब जैसे शासकों ने नज़रअंदाज़ कर अपने पतन का रास्ता तैयार किया था। नेहरू की यह सोच आज के संदर्भ में भी प्रासंगिक है, जब देश में औरंगज़ेब को लेकर बहस छिड़ी हुई है। आज औरंगज़ेब को लेकर कांग्रेस के कई नेताओं की जो सोच है उसे बदलने के लिए किसी और को नहीं तो कम-से-कम वे नेहरू को ही पढ़ लें।

स्रोत: जवाहरलाल नेहरू, औरंगज़ेब, इतिहास, मुगल साम्राज्य, Jawaharlal Nehru, Aurangzeb, History, Mughal Empire,
Tags: AurangzebHistoryJawaharlal NehruMughal Empireइतिहासऔरंगजेबजवाहरलाल नेहरूमुगल साम्राज्य
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