पिछले लगभग डेढ़ महीने से संयुक्त राज्य अमेरिका, ईरान और इज़राइल के बीच जारी युद्ध ने दुनिया को लगातार चौंकाने वाले घटनाक्रम दिखाए हैं। बीते कुछ दिनों में हालात और भी ज्यादा जटिल हो गए हैं, जहां एक तरफ सैन्य कार्रवाई तेज हुई है, वहीं दूसरी तरफ दावों और आरोपों की जंग भी उतनी ही तीखी होती जा रही है। 3 अप्रैल को ईरान ने दावा किया कि उसने कई अमेरिकी लड़ाकू विमान और ड्रोन मार गिराए, जिनमें F-15 Eagle भी शामिल था। इसके बाद 5 अप्रैल को अमेरिका ने दावा किया कि उसने ईरान के भीतर करीब 300 किलोमीटर अंदर घुसकर अपने लापता पायलट को सफलतापूर्वक बचा लिया।
यह रेस्क्यू ऑपरेशन जितना साहसिक बताया गया, उतना ही रहस्यमय भी बन गया। पूरी दुनिया इस ऑपरेशन की जटिलता और इसकी सफलता को लेकर हैरान है। लेकिन इसी बीच ईरान ने एक ऐसा दावा किया, जिसने पूरे घटनाक्रम को एक अलग ही दिशा में मोड़ दिया। ईरान के विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह तथाकथित रेस्क्यू मिशन दरअसल यूरेनियम चोरी करने की कोशिश था, जिसे नाकाम कर दिया गया।
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि अमेरिका का असली मकसद इस्फहान में मौजूद समृद्ध यूरेनियम को चुराना था। उनके मुताबिक, यह ऑपरेशन असफल रहा और अमेरिका को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। इस बयान के बाद एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है, क्या यह सच में एक सफल रेस्क्यू मिशन था या फिर यूरेनियम हासिल करने की असफल कोशिश?
इस पूरे विवाद की जड़ें 29 मार्च को छपी एक रिपोर्ट से जुड़ी हैं, जिसे द वाल स्ट्रीट जर्नल ने प्रकाशित किया था। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि डोनाल्ड ट्रंप ईरान के भीतर घुसकर वहां मौजूद उच्च स्तर के समृद्ध यूरेनियम को निकालने के लिए सैन्य ऑपरेशन पर विचार कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के पास लगभग 440 किलोग्राम यूरेनियम है, जिसे करीब 65 प्रतिशत तक समृद्ध किया जा चुका है। यह मात्रा इतनी है कि जरूरत पड़ने पर इसे 90 प्रतिशत तक बढ़ाकर परमाणु हथियार बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
बताया गया कि यह यूरेनियम इस्फहान में मौजूद हो सकता है, जो ईरान के प्रमुख परमाणु केंद्रों में से एक है। इससे पहले भी अमेरिका और इज़राइल ने इस क्षेत्र को निशाना बनाया था। इसके अलावा फोर्डो और नतांज जैसे अन्य परमाणु केंद्र भी ऐसे स्थान हैं, जहां उच्च स्तर का यूरेनियम मौजूद हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के पास लगभग 1000 किलोग्राम यूरेनियम 20 प्रतिशत तक समृद्ध रूप में है, जबकि करीब 8500 किलोग्राम यूरेनियम 3.6 प्रतिशत स्तर पर मौजूद है, जिसका इस्तेमाल चिकित्सा और अन्य शांतिपूर्ण कार्यों के लिए किया जाता है। लेकिन सबसे ज्यादा चिंता उस यूरेनियम को लेकर है, जो 65 प्रतिशत तक समृद्ध है।
हालांकि, इस यूरेनियम तक पहुंचना आसान नहीं है। ईरान ने अपने परमाणु ठिकानों को जमीन के काफी नीचे और मजबूत सुरक्षा के बीच रखा है। खासतौर पर इस्फहान में मौजूद टनल कॉम्प्लेक्स को इस तरह से तैयार किया गया है कि वहां तक पहुंचने के लिए भारी मशीनरी और तकनीकी संसाधनों की जरूरत पड़ेगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन टनलों के प्रवेश द्वार को भी मिट्टी और मलबे से बंद कर दिया गया है, ताकि किसी भी बाहरी हमले या घुसपैठ को रोका जा सके।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अमेरिका इस तरह की भारी मशीनरी अपने साथ लेकर आया था? कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी ट्रांसपोर्ट विमान, खासकर MC-130J Commando II, इस तरह के मिशन के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इन विमानों में न केवल सैनिक, बल्कि भारी उपकरण भी ले जाए जा सकते हैं।
ईरान के दावे के अनुसार, अमेरिका ने ऐसे ही उपकरणों के साथ यह ऑपरेशन किया था, लेकिन वह असफल रहा। ईरान ने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिका के दो ट्रांसपोर्ट विमान और दो हेलीकॉप्टर या तो गिरा दिए गए या उन्हें मजबूरी में उतारना पड़ा। बाद में अमेरिका ने खुद ही इन विमानों को नष्ट कर दिया, ताकि उनकी तकनीक दुश्मन के हाथ न लगे।
दूसरी तरफ, अमेरिका का कहना है कि उसके दो MC-130J विमानों में तकनीकी खराबी आ गई थी, जिसके कारण वे उड़ान नहीं भर सके। इसलिए उन्हें थर्माइट चार्ज से नष्ट कर दिया गया। ईरान इस दावे को एक बहाना बता रहा है, ताकि असफलता को छिपाया जा सके।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सच्चाई क्या है, यह अभी साफ नहीं हो पाया है। लेकिन इतना जरूर है कि अमेरिका और इज़राइल की नजर लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रही है। यूरेनियम का यह भंडार उनके लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है।
डोनाल्ड ट्रंप पहले भी संकेत दे चुके हैं कि वे इस मुद्दे पर बड़ा कदम उठा सकते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी माना था कि इस तरह का ऑपरेशन बेहद कठिन होगा। लेकिन हाल के घटनाक्रम यह दिखाते हैं कि यह सिर्फ एक संभावना नहीं, बल्कि एक सक्रिय रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है।
अगर यह मिशन वास्तव में सफल होता, तो अमेरिका इसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश करता। लेकिन फिलहाल ऐसा कोई स्पष्ट दावा सामने नहीं आया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि ईरान का यूरेनियम अभी भी उसकी पहुंच से बाहर है।
दूसरी ओर, अगर यह सच में सिर्फ एक रेस्क्यू मिशन था, तो भी इसकी जटिलता और जोखिम अपने आप में बेहद बड़ा था। दुश्मन के इलाके में 300 किलोमीटर अंदर जाकर ऑपरेशन करना किसी भी सेना के लिए आसान नहीं होता।
इस पूरे मामले ने वैश्विक राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। क्या आधुनिक युद्ध सिर्फ हथियारों की लड़ाई है या फिर इसके पीछे छिपे रणनीतिक और संसाधन आधारित उद्देश्य ज्यादा महत्वपूर्ण हैं? यूरेनियम जैसे संसाधन इस संघर्ष को और भी संवेदनशील बना देते हैं।
आखिरकार, इस सवाल का जवाब अभी भी धुंध में है, क्या यह एक सफल रेस्क्यू ऑपरेशन था या असफल यूरेनियम मिशन? लेकिन एक बात तय है कि आने वाले समय में यह मुद्दा और गहराएगा और दुनिया की नजरें इसी पर टिकी रहेंगी।
































