केंद्र सरकार इसी महीने संसद का विशेष सत्र बुला सकती है। इस सत्र में लोकसभा की सीटें बढ़ाने, परिसीमन की प्रक्रिया में बदलाव और महिला आरक्षण लागू करने से जुड़े तीन अहम विधेयक पेश किए जाने की संभावना है। इनमें संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, परिसीमन (संशोधन) विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक शामिल बताए जा रहे हैं। हालांकि, इन विधेयकों को पारित कराने के लिए सरकार को संसद में जरूरी समर्थन जुटाना होगा।
विशेष सत्र की तारीख तय करते समय 26 और 27 अक्टूबर को संविधान सदन में होने वाले 12वें BRICS संसदीय मंच के कार्यक्रम को भी ध्यान में रखा जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, सत्र बुलाने से करीब एक सप्ताह पहले इसकी सूचना दी जा सकती है। संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को समाप्त हुआ था, लेकिन उसका अब तक सत्रावसान नहीं हुआ है।
महिला आरक्षण और परिसीमन का क्या है कनेक्शन?
महिला आरक्षण कानून का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करना है। लेकिन इसे लागू करने की प्रक्रिया परिसीमन और जनगणना से जुड़ी शर्तों के कारण अटकी हुई है।
परिसीमन का मतलब है जनसंख्या और कानूनी प्रावधानों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करना या उनमें बदलाव करना। लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव भी इसी बहस का हिस्सा है। सरकार की कोशिश है कि सीटों के पुनर्गठन और संवैधानिक बदलावों के जरिए महिला आरक्षण को लागू करने का रास्ता तैयार किया जाए।
हालांकि, सीटें बढ़ाने, राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन बनाए रखने और आरक्षण लागू करने के लिए कानूनी प्रावधानों में बदलाव जरूरी हो सकता है। इसलिए प्रस्तावित विधेयकों का महत्व केवल महिलाओं को आरक्षण देने तक सीमित नहीं है। इनका असर संसद की संरचना और राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी पड़ सकता है।
अप्रैल में क्यों अटक गया था सरकार का प्रयास?
सरकार ने 16 और 17 अप्रैल को महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधेयकों पर आगे बढ़ने की कोशिश की थी, लेकिन लोकसभा में जरूरी समर्थन नहीं जुटा पाई। संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन के साथ सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत की संवैधानिक शर्त भी लागू होती है।
सरकार को इसी वजह से केवल सामान्य बहुमत के भरोसे नहीं, बल्कि विपक्ष और अन्य दलों के पर्याप्त समर्थन की जरूरत है। मानसून सत्र में भी सरकार इन विधेयकों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर सकती थी, लेकिन NEET पेपर लीक और छात्र प्रदर्शनों पर कार्रवाई को लेकर विपक्ष के विरोध के बीच यह प्रयास आगे नहीं बढ़ पाया।
लोकसभा और राज्यसभा में कितने सांसदों का समर्थन चाहिए?
लोकसभा में कुल निर्धारित सदस्य संख्या 543 है। दो-तिहाई का आंकड़ा 362 होता है, जबकि दो-तिहाई समर्थन की गणना उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के आधार पर भी होती है। इसलिए वास्तविक आवश्यक संख्या मतदान के समय सदन में मौजूद सदस्यों और लागू संवैधानिक शर्तों पर निर्भर करेगी।
दूसरी ओर, राज्यसभा में कुल निर्धारित सदस्य संख्या 245 है। संविधान संशोधन विधेयक के लिए यहां भी विशेष बहुमत की जरूरत होगी। खाली सीटों, उपस्थित सदस्यों और मतदान के आधार पर आवश्यक वोटों की गणना में अंतर हो सकता है।
यही कारण है कि सरकार के लिए छोटे दलों और गैर-एनडीए दलों का समर्थन महत्वपूर्ण होगा। केवल एनडीए के मौजूदा संख्याबल के आधार पर दोनों सदनों में विधेयक पारित होने की गारंटी नहीं मानी जा सकती।
क्या DMK का समर्थन निर्णायक हो सकता है?
रिपोर्टों के मुताबिक, केंद्र सरकार DMK समेत कुछ दलों से समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है। तमिलनाडु की राजनीति में कांग्रेस और DMK के संबंधों में बदलाव तथा विपक्षी गठबंधन के भीतर समीकरणों को लेकर चर्चा के बीच सरकार की रणनीति पर नजर रहेगी।
हालांकि, किसी दल के गठबंधन से दूर होने या उसके साथ राजनीतिक मतभेद होने का मतलब यह नहीं कि वह किसी खास विधेयक का समर्थन जरूर करेगा। DMK और अन्य दलों का अंतिम रुख उनके आधिकारिक बयान और मतदान से ही स्पष्ट होगा।
आगे क्या होगा?
विशेष सत्र बुलाने का फैसला अपने आप में विधेयकों के पारित होने की गारंटी नहीं है। सरकार को पहले विधेयकों का अंतिम स्वरूप और संवैधानिक प्रावधान स्पष्ट करने होंगे, फिर दोनों सदनों में आवश्यक समर्थन हासिल करना होगा। इसके बाद भी संविधान संशोधन की प्रक्रिया पूरी करने के लिए निर्धारित संवैधानिक औपचारिकताएं जरूरी होंगी।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार महिला आरक्षण को लागू करने के लिए जरूरी राजनीतिक सहमति बना पाएगी। अगर विधेयक पारित होते हैं, तो लोकसभा की संरचना, निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन और महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर इसका व्यापक असर पड़ सकता है। लेकिन अंतिम नतीजा संसद में पेश किए जाने वाले विधेयकों, उनके प्रावधानों और मतदान के दौरान बनने वाले संख्याबल पर निर्भर करेगा।


































